सकृन्मनः कृष्णपदारविन्दयो- /Sakr̥an manaḥ kr̥iṣhṇa
सकृन्मनः कृष्णपदारविन्दयो-
र्निवेशितं तद्गुणरागि यैरिह |
न ते यमं पाशभृतश्च तद्भटान्
स्वप्नेपि पश्यन्ति हि चीर्णनिष्कृताः ||
जिनके मनरूपी मघुर-मधुकर एक बार भी भगवान श्री कृष्ण के चरणारविंद रूपी मकरंद का पान कर लिया उन्होंने संपूर्ण प्रायश्चित कर लिया उन्हें स्वप्न में भी यमराज और उनके दूतों का दर्शन नहीं होता,,,
सकृन्मनः कृष्णपदारविन्दयो- /Sakr̥an manaḥ kr̥iṣhṇa
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