राम कथा हिंदी में लिखी हुई-12 ram katha list
यहां ब्राह्मणों के श्राप देते ही
कालकेतु राक्षस और कपटी मुनि कई राजाओं को एकत्रित कर प्रतापभानु के राज्य पर
चढ़ाई कर दिया। उस युद्ध में राजा मारा गया उसके कुल में कोई भी नहीं बचा।
सत्यकेतु
कुल कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा।।
यज्वल्क्य जी कहते हैं है भारद्वाज
सुनो विधाता जब जिसके विपरीत होते हैं तब उसके लिए धूल सुमेरु पर्वत के समान, पिता
यमराज के समान और रस्सी सांप के समान हो जाती है।
याग्यवल्क जी कहते हैं- हे मुनि सुनो
समय पाकर वही राजा समाज के सहित राक्षस हुआ उसके 10 सर और 20 भुजाएं थी उस वीर का नाम रावण था। उसका छोटा भाई अरिमर्दन कुंभकरण बल का
धाम हुआ और जो उसका धर्मरूचि नाम का मंत्री था वह उसका छोटा सौतेला भाई विभीषण था।
जो राजा के बहुत से बेटे थे और सेवक थे वह भी सब राक्षस हुए। वे खल मनमाना रूप
धारण करने वाले कुटिल भयंकर और विवेक रहित थे तथा निर्दयी हिंसक और पापी थे। यद्यपि
वह पुलस्त्य कुल में उत्पन्न हुए जो पावन निर्मल और अनूप था। फिर भी श्राप के कारण
पाप रूप ही पैदा हुए। तीनों भाइयों ने उग्र तप किया तप को देख ब्रह्मा निकट गए और
कहा तात मैं प्रसन्न हूं वर मांगो। रावण ब्रह्मा जी के चरणों को पड़कर के कहा-
करि
बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा।।
हम काहू के मरहिं न मांरे। बानर मनुज जाति दुइ बारें।।
वानर और मनुष्य छोड़ हम किसी के मारे
ना मरें यह वर दीजिए। तब भगवान शंकर और ब्रह्मा जी दोनों ने एवमस्तु कह वर दिया।
फिर ब्रह्मा जी कुंभकरण के पास गए उसको देखकर के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह
दुष्ट अगर प्रतिदिन आहार करेगा तो सारा संसार उजड़ जाएगा। तब उन्होंने सरस्वती को
प्रेरित करके उसकी बुद्धि फेर दी तो उसने 6 महीने की नींद मांग ली। फिर
ब्रह्मा जी विभीषण के पास गए और बोले हे पुत्र वर मांगो उसने भगवान के चरण कमल में
निर्मल निष्काम और अनन्य प्रेम मांगा। उन्हें वर देकर ब्रह्मदेव तो चले गए वे
तीनों हर्षित होकर अपने घर आ गए। मयदानव की बेटी मंदोदरी को मय ने लाकर रावण को दे
दिया। रावण का विवाह मंदोदरी से हुआ। फिर दोनों भाइयों का विवाह हुआ कुंभकरण का
वज्रज्वाल से। विभीषण का सरमा से विवाह किया।
समुद्र के बीच में त्रिकूट नामक
पर्वत पर ब्रह्मा जी का बनाया हुआ एक बड़ा भारी महल था। मैदानव ने उसको और सजा
दिया जगत में उसका नाम लंका प्रसिद्ध है। जो राक्षसों का राजा होता था उसमे वही
निवास करता था। रावण लंका में निवास करने लगा। वह सब को सताने लगा। कुबेर से उसने
पुष्पक विमान भी छुड़ा लिया। एक बार उसने खिलवाड़ में ही कैलाश पर्वत को उठा लिया
और और अपने को बहुत बलशाली समझकर प्रसन्न हो होता रहा।
रावण के चलने पर धरती डोलती थी।
सूर्य,
चंद्र, वायु, वरुण,
कुबेर, अग्नि, काल,
यम,किन्नर, सिद्ध,
मनुज और नाग सब उसकी आज्ञा मानते थे और लंका में प्रणाम करने आते
थे। उसने लोकपालों को जेल खाने में डाल रखा था। रावण और उनके अनुचरों ने पापाचार-
अत्याचार की सीमा को पार कर गये देवता मनुष्य ऋषि सभी को प्रताड़ित करने लगे।
जेहि
बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला।।
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं।।
वह धर्म को नष्ट करने में लगे रहते
थे, वेद विरुद्ध काम करते थे। जहां जिस गांव में गौ, ब्राह्मणों
को पाते थे उस नगर गांव को आग लगा देते थे। गुरु, ब्राह्मण
को कोई मानता ना था। कहीं हरिभक्ति, यज्ञ, तप और ज्ञान का पता न था और वेद पुराण कोई सपने में भी नहीं सुनता था। अत्यंत
धर्म की ग्लानि देखकर परम सवित हो पृथ्वी विकल हो उठी। कांप उठी। धारण करने से
धर्म कहलाता है और धर्म ही प्रजा को धारण करता है।
धारणात
धर्म इत्याहु धर्मोधारयति प्रजाः।
रावण के राज्य में पापाचार अत्याचार
और धर्म के नास से पृथ्वी व्याकुल हो उठी।
अतिसय
देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी।।
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही।।
सोचने लगी कि पर्वतों नदियों और
समुद्रों का बोझ मुझे इतना भारी नहीं जान पड़ता जितना भारी मुझे एक पर द्रोही (
पापी ) लगता है। तब पृथ्वी माता गाय का रूप धारण कर वहां गई जहां सब देवता और मुनी
उपस्थित थे। पृथ्वी ने रोकर अपना दुख सुनाया। तब देवता मुनि गंधर्व सब मिलकर
ब्रह्मा जी के पास गए सत्यलोक में। ब्रह्मा जी ने कहा कि जो अविनाशी हैं वही हमारे
सहायक होंगे। सब विचार करने लगे की प्रभु को हम सब कहां पाएं? कोई
बैकुंठ पुरी जाने को कहता था। कोई कहता था कि वही प्रभु समुद्र में निवास करते
हैं। हे पार्वती उसी जगह मैं भी था अवसर पाकर मैं एक बात कही। हे देवताओं सुनो!
हरि
ब्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।।
भगवान सब जगह समान रूप से व्यापक
हैं। प्रेम से वह प्रगट हो जाते हैं। ऐसी कोई जगह नहीं जहां पर प्रभु ना हों। तब
सारे देवताओं के मन में प्रसन्नता छा गई, उनका तन पुलकित हो गया और
नेत्रों से प्रेम के आंसू बहने लगे और सब देवताओं ने हाथ जोड़कर के श्री हरि की
स्तुति करना प्रारंभ कर दिये!
जय
जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।
गो
द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता।।
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोइ।
जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोइ।।
जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा।
अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा।।
जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा।
निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानंदा।।
जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा।
सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा।।
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा।
मन बच क्रम बानी छाङि सयानी सरन सकल सूरजूथा।।
सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना।
जेहिं दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवहु सो श्रीभगवउाना।।
भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा।
मुनि सिध्द सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा।।
जानि सभय सुरभूमि सुनि बचन समेत सनेह।
गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह।।
1-
सुरनाय, 2- जनसुखदायक, 3- गो, 4- द्विज हितकारी। सूर, संत,
गौ, विप्र चार नाम कहे। इन्हीं चार के लिए
भगवान का अवतार होता है।
विप्र
धेनु सुर सन्त हित लीन मनुज अवतार।
यह स्तुति का भाव है कि हे देवताओं
के स्वामी,
सेवकों को सुख देने वाले, शरणागत की रक्षा
करने वाले आपकी सदा जय हो। आपकी लीला अद्भुत है उसका भेद कोई नहीं जानता। हम सब
दुखीजन आपकी शरण में हैं। आप हम पर कृपा कीजिए हमको दुख से उबारिये। देवता और
पृथ्वी को भयभीत जानकार और उनके स्नेह युक्त वचन सुनकर शोक और संदेह को हरने वाली
गंभीर आकाशवाणी हुई।
जनि
डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेषा।।
हरिहउँ सकल भूमि गरुआई। निर्भय होहु देव समुदाई।।
हे मुनियों, सिद्धों
और देवताओं आप डरिए नहीं मैं मनुष्य का रूप धारण करूंगा और पवित्र सूर्यवंश में
अंशो सहित मनुष्य अवतार लूंगा। पृथ्वी का सब भार हर लूंगा तुम निर्भय हो जाओ ,
भगवान की वाणी सुनकर देवता तुरंत लौट गए उनका हृदय शीतल हो गया।
ब्रह्मा जी सब देवताओं को समझाएं हैं कि तुम लोग भी जाकर पृथ्वी पर शरीर धारण करो
वानरों का और भगवान की चरण सेवा करो।
आईये अब हम सब अयोध्या धाम की ओर
चलें! अवधपुरी में रघुकुल शिरोमणि दशरथ नाम के राजा हुए जिनका नाम वेदों में
विख्यात है। वे धर्म धुरन्धर, गुणो के भंडार और ज्ञानी थे। उनकी
कौशल्या आदि प्रिय रानियां सभी पवित्र आचरण वाली थीं और सबका श्री हरि के चरण
कमलों में दृढ़ प्रेम था।
बोलिए
अयोध्या धाम की जय
महाराज दशरथ है की जय
अयोध्या रामलला की जय
सज्जनों महाराज दशरथ बड़े आनंद से
अपने राज्य का संचालन कर रहे हैं। उनके राज्य में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं
है। अगर कमी है तो वह क्या है? सुनिए-
एक
बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं।।
बस एक चिंता है महाराज के मन में की
मेरे कोई पुत्र नहीं है। ख्याल तो बहुत बार हुआ पर एक बार ग्लानी हुई कि मुझे सब
कुछ है पर पुत्र नहीं। भूपति का भाव की संपूर्ण भू यानी पृथ्वी राज्य का भार जिस
पर है। उसे बेटा नहीं की बोझ उस पर छोड़ सके तीनपन बीत चुके हैं अब चौथापन है।
बेटे के लिए इतने विवाह किया पर किसी को पुत्र ना हुआ। पुत्री की बात नहीं कहते
क्यूंकि सुमित्रा के शांता नाम की पुत्री सुनी जाती है।
अपुत्रस्य
गृहं शून्यम्। अपुत्रस्य गतिर्नास्ति।
नीति शास्त्र कहता है जिसे पुत्र
नहीं उसका घर सूना रहता है। स्वयं वेद कहते हैं कि पुत्र से ही यह लोक जीता जाता
है।
पुत्रेणैवायं
लोको जय्यः।
महाराज दशरथ ने आज गुरु को बुलाया
नहीं स्वयं उनके घर गए हैं।
गुरु
गृह गयउ तुरत महिपाला।
