bhagwat pratham skandh 1 श्रीमद्भागवत महापुराण कथानक प्रथम स्कंध1

 भागवत कथानक प्रथम स्कंध ,भाग- 1
श्रीमद्भागवत महापुराण सप्ताहिक कथा Bhagwat Katha story in hindi

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श्रीमद्भागवत में 12 स्कन्ध  335 अध्याय और 18000 श्लोक हैं |
तेनेयम् वाड़मयि मूर्तिः प्रत्यक्षः कृष्ण एवहि |
यह साक्षात भगवान श्रीहरि का स्वरुप है उनकी शब्द मई मूर्ति है कौशिकी संहिता में कहा 
गया है |
पादौ तु प्रथमः स्कन्धः द्वितीयो जानुनीश्रुतः |
तृतीयः संस्थनी ज्ञेय चतुर्थः कटि रुच्यते   ||
नाभिं तु पञ्चमं विद्यात ह्रदयं षष्ठं ईरितं |
सप्तमस्तु उरः प्रोक्तं अष्टमःकंण्ठ रुच्यते ||
स्कन्धस्तु नवमःस्कन्धःदशमो मुखभीरितं |
कर्णाक्षं नासिका युक्तं सर्वार्थ परिपूरितं ||
एकादसस्तुत्रमागं द्वादशं ब्रह्मस्ध्रकम् |
एवं भागवतं शास्त्रं विष्णुमूर्तिप्रकीर्तितम् ||


प्रथम स्कंध भगवान श्री हरि के चरण हैं दूसरा घुटने हैं तीसरा जंघा चौथा कमर है पांचवा स्कंध नाभि छठवां ह्रदय सातवा छाती आठवां कंठ नौवां कंधा 10वां कान आंख नासिका से युक्त संपूर्ण मुख्य मंडल 11 वां मस्तक और बारहवां स्कंध ब्रह्म रंध्र इस प्रकार यह संपूर्ण भागवत भगवान का ही स्वरुप है इस भागवत का मंगलाचरण अत्यंत विलक्षण है। 

ब्रह्म सूत्र का पहला सूत्र--  अथातो ब्रह्म जिज्ञासा है और दूसरा सूत्र-- जन्माद्यस्य यतः, है वेदांत का प्रारंभ अथ इस शब्द से होता है तात्पर्य यह है इस जगत में जिसका भी जन्म हुआ है वह सभी इस भागवत के सुनने के अधिकारी हैं। 

धीमहि के द्वारा यहां वैदिकत्व को दिखलाया गया है जैसे गायत्री मंत्र में धीमहि का प्रयोग होता है ऐसे ही यहां पर धीमहि का प्रयोग किया गया है जो पाणिनीय व्याकरण से नहीं बनता बल्कि वैदिक व्याकरण में धीमहि का प्रयोग होता है आचार्य श्री बंशीधर जी ने इस मंगलाचरण के 108 अर्थ किए हैं उनमें से हम यहां ब्रह्म परक अर्थ का आश्रय लेते हैं |

जन्माद्यस्य यतोन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्
    तेने ब्रह्मह्रदाय आदि कवये मुह्यन्ति यत्सूरयः |
तेजो वारिमृदां यथा विनिमयो यत्रत्रिसर्गो मृषा 
 धाम्ना स्वेन सदानिरस्तकुहकं सत्यंपरं धीमहि ||
जिससे इस जगत की उत्पत्ति पालन और संघार होता है | जो शत पदार्थों में अनुगत हैं और असद पदार्थों से पृथक हैं सर्वज्ञ है स्वयंप्रकाश है जिन्होंने सृष्टि के आदि में आदिकवि ब्रह्मा जी को संकल्प मात्र से ब्रह्मा जी को वेद का ज्ञान प्राप्त किया जिसके विषय में बड़े-बड़े विद्वान भी मोहित हो जाते हैं। 

जैसे तेज में जल का जल में स्थल का और स्थल में जल का भ्रम होता है उसी प्रकार यह त्रिगुण मई जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति रूपा सृष्टि मिथ्या  होने पर भी सत्य प्रतीत हो रही है जो अपने स्वयं प्रकाश से माया एवं माया के कार्य से सर्वथा मुक्त हैं ऐसे सत्यस्वरूप भगवान का हम ध्यान करते हैं। 


धर्मः प्रोज्झितकैतवोत्र परमोनिर्मत्सराणां सतां  
 वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् |
श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैैरीश्वरः
सद्योह्रद्यवरुध्यतेत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात्|
इस श्लोक में अनुबंध चतुष्टय का वर्णन किया गया है इस श्रीमद्भागवत का विषय क्या है |
धर्मः प्रोज्झितकैतवः इसमें कपट रहित परम धर्म का निरूपण किया गया है यही भागवत का विषय है भागवत के अधिकारी कौन है | निरर्मत्सराणां मत्सरता से रहित सत्पुरुष ही इसके अधिकारी हैं श्रीधर स्वामी जी कहते हैं------
परोत्कर्षा सहनं न इति मत्सरः|
जो दूसरे का उत्कर्ष को सह नहीं सकता उसे ही मत्सर कहते हैं |ऐसे मत्सर  से रहित सत्पुरुष ही भागवत की अधिकारी हैं | तापत्रयोन्मूलनम् आध्यात्मिक आधिदैविक आधिभौतिक इन तीन प्रकार के पापों का नाश करना ही भागवत का प्रयोजन है इसका संबंध क्या है इस भागवत की श्रवण करने की इच्छा मात्र से भगवान श्रीहरि हृदय में आकर बंदी बन जाते हैं यही भागवत का संबंध है ऐसे महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा रचित श्रीमद्भागवत के रहते हुए अन्य शास्त्रों से क्या प्रयोजन |
निगमकल्पतरोर्गलितं फलं 
      शुकमुखादमृतद्रव सयुंतम् |
पिबत भागवतं रसमालयं
      मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ||
यह वेद रूपी वृक्ष का पूर्ण परिपक्व फल है शुकदेव रूपी तोते के मुंह का स्पर्श हो जाने के कारण यह अमृत द्रव से युक्त है जिसमे छिलका गुठली आदि त्याज्य अन्स  बिल्कुल भी नहीं है इसलिए हे रसिको ,हे भावुको जब तक जीवन है तब तक बारंबार इस भागवत रस का पान करो क्योंकि----


स्वर्गे सत्ये च कैलाशे वैकुणठे नास्तयं रसः |
अतः पिबन्तु सद्भाग्या या या मुञ्चत कर्हिचित् ||
यह भागवत रस स्वर्ग लोक सत्यलोक कैलाश और बैकुंठ में भी नहीं है मात्र पृथ्वी में ही सुलभ है इसलिए सदा इसका पान करो |

नैमिष निमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः |
सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्त्रसममासत ||
एक बार सौनक आदि ऋषि  ब्रह्मा जी के पास गए और उनसे कहा प्रभु कलिकाल के कारण पृथ्वी में प्रायः अधर्मियों का वास हो गया है आप जप तप साधन करने के लिए पृथ्वी में कोई उपयुक्त स्थान बतलाइए उस समय ब्रह्मा जी ने 1 चक्र छोडा और कहा ऋषियो यह चक्र पृथ्वी में जिस स्थान पर जाकर गिरेगा वही स्थान जप आदि साधनों के लिए उपयुक्त रहेगा।

सनकादि ऋषि उस चक्र का पीछा करने लगे वह चक्र एक वन में आकर गिर गया वही नैमिसारण तीर्थ हुआ ऐसे पवित्र नैमिषारण्य तीर्थ में सनकादि ऋषि ने 1000 वर्ष में पूर्ण होने वाले सत्र की दीक्षा ली एक दिन प्रातः काल अग्निहोत्र आदि कर्मो से निर्वित्त हो शौनकादि ऋषियो ने सूत जी का पूजन किया और उनसे 6 प्रश्न पूछे |

किं श्रेयः शास्त्र सारः कः स्वावतारः प्रयोजनम् |
किं कर्म केवताराश्च धर्मः कः शरणं गताः ||
पहला प्रश्न मनुष्यों के एकमात्र कल्याण का कारण क्या है दूसरा प्रश्न पूछा शास्त्र बहुत से हैं उनमें अनेकों प्रकार के कर्मों का वर्णन किया गया है मनुष्य को क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए तीसरा प्रश्न पूछा भगवान श्री कृष्ण देवकी और वसुदेव के यहां क्या करने की इच्छा से उत्तीर्ण हुए थे चौथा प्रश्न पूछा भगवान के उदार चरित्र जिस का गान बड़े-बड़े विद्वान करते हैं आप भगवान की लीलाओं का वर्णन कीजिए।

 पांचवा प्रश्न पूछा भगवान श्रीहरि के प्रमुख कितने अवतार हुए हैं और छठवां प्रश्न पूछे जब भगवान श्री हरि भगवान श्री कृष्ण चंद्र अपने धाम में चले गए तब----  धर्मं कं शरणं गतः धर्म किसकी शरण में गया सौनकादि ऋषि के इस प्रकार प्रश्न पूछने पर सूतजीने अपने गुरुदेव श्री सुखदेव जी का मंगलाचरण किया |

यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक
       मध्यात्मदीप मतितिर्षतां तमोन्धम् |
संसारिणां करुणयाह पुराणगुह्मं
        तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् ||
शौनक जी यह श्रीमद्भागवत महापुराण आत्म स्वरूप का अनुभव कराने वाला है और समस्त वेदों का सार है अज्ञान अंधकार में पड़े हुए और इस संसार सागर से पार पाने के इच्छुक प्राणियों पर करूणा कृपा करके श्री सुखदेव जी ने यह अध्यात्म दीप प्रज्वलित किया है ऐसे व्यास जी के पुत्र और प्राणियों के गुरु श्री सुखदेव जी को मैं प्रणाम करता हूं उन की शरण ग्रहण करता हूं |


नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् |
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जय मुदीरयेत् ||
भगवान नारायण देवी सरस्वती और व्यास जी को भी मैं बारंबार नमस्कार करता हूं इस श्लोक में आया है जय मुदीरयेत जय का अर्थ यहां पर जय घोष आदि करना नहीं है जय क्या है |
इतिहास पुराणां मे रामश्च चरितं तथा |
जयेति नाम चैतेषां प्रवदन्ति मनीषिणः ||
 इतिहास महाभारत पुराण बाल्मीकि रामायण इन को विद्वान लोग जय नाम से पुकारते हैं और मुनियों आपने लोक के मंगल के लिए बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है |
स वै पुसां परोधर्मो यतो भक्ति रधोक्षजे |
अहैतुक्य प्रतिहिता ययात्मा सम्प्रसीदति || 
मनुष्य का परम धर्म वही है जिसके करने से भगवान श्री हरि की भक्ति प्राप्त हो और वह भक्ति निस्काम हो तथा सदा बनी रहे क्योंकि कहा गया है |

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प्रेम मे ना हो वासना तो वरदान बन जाए | 
भक्त में ना हो कामना तो भगवान बन जाए ||

भगवान श्री हरि की ऐसी निष्काम भक्ति शीघ्र ही ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न करती है |

धर्मः स्वनिष्ठितः पुसां विष्वक्सेन कथासु यः |

नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ||
मनुष्य भली प्रकार से स्वधर्म का पालन करता है परंतु उसको धर्म के पालन करने से भगवान और भगवान की कथाओं में प्रेम उत्पन्न नहीं होता वह तो केवल श्रम ही है क्योंकि धर्म का फल मोक्ष को प्राप्त करना है ,धर्म के द्वारा अर्थ कमाना धन कमाना धर्म का फल नहीं है| अर्थ का फल धर्म करना है कामनाओं का उपयोग करना अर्थ का फल नहीं है| 

जितने से जीवन यापन हो जाए उतना ही उपयोग करना चाहिए इंद्रियों की प्रसन्नता के लिए कार्य का भोग नहीं करना चाहिए क्योंकि यह जीवन तत्व जिज्ञासा के लिए उत्पन्न हुआ है बहुत से कर्म करके स्वर्ग आदि को प्राप्त करना इस जीवन का फल नहीं है | 


वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् |

ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ||
उस तत्व को ज्ञानी ब्रह्म कहते हैं योगी परमात्मा कहते हैं और भक्त भगवान कहते हैं | 
एकं सद्विप्रा बहुधा वदंति | एक ही तत्व को विद्वान अनेकों नाम से पुकारते हैं |



विद्यते ह्रदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्व संसयाः |

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्टएवात्मनीश्वरे ||
जब उस तत्व का ज्ञान होता है तब ह्रदय की गांठ खुल जाती है समस्त संदेह निवृत्त हो जाते हैं और कर्म बंधन छीड़ हो जाते हैं वही परमात्मा जगत की उत्पत्ति पालन और संघार के लिए देवता पशु पक्षी और मनुष्य आदि योनियों में अनेकों बार अवतार ग्रहण करते हैं जिसमें भगवान के 24 अवतार प्रधान है |


     भगवान के 24 अवतारों का वर्णन
भगवान श्रीहरि का पहला अवतार सनक सनंदन सनातन और सनत कुमार के रूप में हुआ दूसरा अवतार वराह के रूप में तीसरा अवतार देवर्षि नारद चौथा अवतार नर-नारायण के रूप में पांचवा अवतार कपिल भगवान के रूप में छठे अवतार दत्तात्रेय के रूप में सातवें अवतार यज्ञ आठवां अवतार ऋषभदेव नौवां अवतार महाराज पृथु दसवां अवतार मत्स्य के रूप में 11 वां अवतार कक्षप 12 में अवतार धन्वंतरि 13 में अवतार मोहनी 14 अवतार नृर्सिंघं 15 में अवतार वामन 16 अवतार परशुराम 17अवतार व्यास जी 18 अवतार राम 19 बलराम 20अवतार कृष्ण 21अवतार हरि22 अवतार हंस 23बुद्ध और 24 अवतार कलयुग की समाप्ति पर जब राजा लुटेरे हो जाएंगे सर्वत्र अधर्म व्याप्त हो जाएगा उस समय संभल ग्राम में विष्णु यस नामक ब्राह्मण के घर में कल्कि भगवान का अवतार होगा | 

सौनक जी यह भागवत नाम का पुराण वेदों से सम्मत है इसे मैंने श्री सुखदेव जी की कृपा से उन्हीं के अनुग्रह से जव वेराजा परीक्षित को कथा सुना रहे थे उसी समय मैंने भी इसका अध्ययन किया |
तदपि जथा श्रुत जस मति मोरी |
 कहिहंउ देखि प्रीति अति तोरी ||
इसी को जैसा मैंने सुना और जितना मेरी बुद्धि ने ग्रहण किया उसी के अनुरूप में तुम लोगों को सुनाऊंगा | सौनक जी पूछते हैं---
कस्मिन युगे प्रवृत्तेयं स्थाने वा केन हेतुना |
कुतः सन्चोदितः कृष्णः कृतवान संहितां मुनिः ||
इस श्रीमद् भागवत महापुराण का निर्माण वेदव्यास जी ने किस युग में किया किस स्थान पर तथा किस कारण से किया तब श्री सूतजी कहते हैं-----
द्वापरे समनुपप्राप्ते तृतीये युग पर्यये |
जातः पराशरद्योगी वासव्यां कलयाहरे ||
सौनक जी तीसरे युग द्वापर में महर्षि पाराशर के द्वारा वसुकन्या सत्यवती के गर्भ से भगवान के कला अवतार श्री वेदव्यास जी भगवान का जन्म हुआ व्यास जी भूत भविष्य के जानकार थे उन्होंने भविष्य पर दृष्टि डाली तो देखा कलयुग के प्राणी कम बुद्धि वाले कम आयु वाले और भाग्यहीन होंगे आलसी होंगे।

उस समय उन्होंने प्राणियों की सरलता के लिए एक वेद के चार भाग किए ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद ऋग्वेद अपने शिष्य महर्षि पैल  को प्रदान किया सामवेद जैमिनी को यजुर्वेद वैशम्पायन  को और अथर्ववेद सुमन्तु ऋषि को प्रदान किया इतने पर भी उन्होंने देखा |

स्त्रीशूद्र द्विज बन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचराः |
स्त्री शूद्र और अधम ब्राह्मणों का वेद में अधिकार नहीं है तब उन्होंने एक लाख श्लोकात्मक महाभारत ग्रंथ की रचना की इतने पर भी जब उन्हें संतोष नहीं हुआ तो वह भगवान का चिंतन करने लगे उसी समय देवर्षि नारद आये महर्षि वेदव्यास जी ने उनका पूजन किया उन्हें आसन  प्रदान किया तब देवर्षि नारद ने कहा।

हे पाराशर नंदन व्यास जी आपने एक वेद के चार भाग कर दिए महाभारत जैसे एक लाख श्लोक वाला इतिहास की रचना कर दी फिर भी आप इस प्रकार अप्रसन्न क्यों हैं वेद व्यास जी ने कहा देवर्षि आपका कथन सत्य है परंतु मैं स्वयं इस अप्रसन्नता का कारण नहीं जानता आप ही इसका समाधान करें |

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यथा धर्मादयश्चार्था मुनिवर्यानुकीर्तिताः |
न तथा वासुदेवस्य महिमाह्यनुवर्णितः ||
वेदव्यास जी आपने जिस प्रकार धर्म अर्थ काम और मोक्ष पुरुषार्थ का पुराणों में वर्णन किया है उस प्रकार आपने भगवान तथा भगवान की भक्ति का वर्णन नहीं किया आपने क्योंकि कहा गया है|

नैष्कर्म्य मप्यच्युत भाव वर्जितं
न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् |
कोई काम निष्कामता से युक्त हो परंतु भगवान की भक्ति से रहित हो तो उसकी शोभा नहीं होती इसलिए आप समाधि में भगवान की लीलाओं का स्मरण कीजिए और भगवान की व सुंदर सुंदर लिलाओं की रचना कीजिए भगवान करुणावत्सल है करुणा की मूर्ति हैं वह जरूर आप पर कृपा करेंगे और आपका यह अप्रसन्नता का कारण हट जाएगा |
अहं पुरातीत भवे भवं मुने
       दास्यास्तु कस्याश्चन वेदवादिनाम् |
निरूपितो बालक एव योगिनां
        शुश्रूषणे प्रावृषि निर्विविक्षताम् ||
व्यास  जी मैं पूर्व जन्म एक दासी का पुत्र था मेरा जन्म हुआ और मेरा इतना बड़ा दुर्भाग्य मेरे छोटे में ही मेरे पिता जी का स्वर्गवास हो गया था मेरी मां मेरा लालन पालन करने लगी एक दिन मेरे गांव में कुछ वेदपाठी ब्राह्मण चातुर्मास व्यतीत करने आए और उनकी सेवा में मुझे नियुक्त कर दिया गया मैं मनोयोग से उनकी सेवा करने लगा उनके भोजन कर लेने के पश्चात उनकी पत्तल में जो कुछ भी झूठा प्रसाद बस जाता उसे मैं उनकी ही अनुमति से खा लेता। 50+ धार्मिक कहानी व दृष्टान्त पड़ें- click hear

इससे मेरे समस्त पाप धुल गए उनके धर्म में मेरी रुचि हो गई वह ब्राह्मण प्रति दिन भगवान श्री कृष्ण की लीला का गान करते जिसे सुनने से रजोगुण और तमोगुण को नाश करने वाली भक्ति का मेरे हृदय में प्रादुर्भाव हो गया चातुर्मास व्यतीत कर जब वे ब्राह्मण जाने लगे तो मैं भी उनके पीछे पीछे चल दिया।
मुझे आता हुआ देख उन्होंने कहा बेटा अभी तुम्हारी मां जीवित है तुम्हारे अलावा उसका और कोई सहारा नहीं है इसलिए तुम्हें उनकी सेवा करनी चाहिए यह सुन मैं उदास हो गया तब उन्होंने मुझे एक मंत्र दिया |
नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमहि |
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सकंर्षणाय च ||
चतुरब्यूह मन्त्र  दिया और आशीर्वाद दिया तुम्हें अपने इस जीवन में भगवान का दर्शन अवश्य होगा मैं प्रतिदिन इस का जप करने लगा एक दिन सायं काल मेरी मां गाय दुहने के लिए निकली अनजान में उनका पैर एक सर्प पर पड़ गया जिससे उसने मां को डस लिया और मां का प्रांणात हो गया मैंने मां का अंत्य कर्म किया और|

अनुग्रहं मन्यमानः प्रातिष्ठं दिशमुत्तराम् |
भगवान का अनुग्रह मानकर उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा अनेकों पर्वतों वनों को पार कर एक स्थान पर पहुंचा बहुत थक गया था वहां मैंने एक सरोवर में स्नान किया जल पिया और वही पीपल के वृक्ष के नीचे आसन लगाकर बैठ गया और जैसा ऋषि यों ने बताया था उसी के अनुरूप भगवान का ध्यान करने लगा भगवत प्राप्त की उत्कट अभिलाषा के कारण मेरी आंखों से आंसू प्रवाह होने लगा।

उसी समय भगवान का असली विग्रह मेरे हृदय में प्रकट हो गया उसे देख में आनंदित हो गया एकाएक वह छवि अंतर्ध्यान हो गई उसे ना देख मैं व्याकुल हो गया पुनः दर्शन की इच्छा से ध्यान लगाया परंतु मैं उसे देख नहीं सका उसी समय आकाशवाणी हुई|

अभिपक्वाकषायाणां दुर्दर्षोहं कुयोगिनाम् |
जिनकी विषय वासना अभी नृवित्ति नहीं हुई है ऐसे अधकचरे कुयोगियों को मेरा दर्शन हुआ ही नहीं करता तुम्हें जो एक बार दर्शन हुआ है वह मुझ में प्रेम उत्पन्न करने तथा ऋषि यों की वाणी सत्य करने के लिए हुआ था अब इस जन्म में मैं तुम्हें मेरा दर्शन नहीं होगा इस जन्म के पश्चात तुम्हारा जो अगला जन्म होगा उसमें तुम मेरे नित्य पार्षद होगी इस आकाशवाणी को सुन मैं निस्प्रिह हो कार्य कर काल की प्रतीक्षा करता हुआ पृथ्वी में भ्रमण करने लगा।

समय आने पर मेरा यह पंचभौतिक शरीर छूट गया और कल के अंत में जब भगवान नारायण के सोने की इच्छा हुई उस समय मैं ब्रह्मा जी के साथ उनकी स्वास् के द्वारा उनके हृदय में प्रविष्ट हो गया और 1000 चतुर्युगी के पश्चात पुनः सृष्टि हुई तो मैं ब्रह्मा जी के पुत्र के रूप में उत्पन्न हुआ भगवान नारायण ने मुझे यह वीणा दी जिसे बजाता हुआ मैं निरंतर उन्हीं के नाम का कीर्तन करता रहता हूं।

व्यास जी देखा आपने भगवान की महिमा कहा तो मैं दासी पुत्र था और अब देवर्षि नारद हो गया इस प्रकार भगावन नाम की महिमा का वर्णन कर देवर्षि नारद वहां से चले गए यहां ब्रह्म नदी सरस्वती के पश्चिम तट में सम्यप्रास  नामक आश्रम में वेद व्यास जी का मन भगवान में समाहित हुआ और भागवत पुराण की रचना कर सुकदेव जी को पढ़ाया।

शौनक जी कहते हैं श्री सुखदेव जी तो निवृत्ति परायण हैं उत्पन्न होते ही घर छोड़कर वन में चले गए थे फिर उन्होंने किस कारण से इस श्रीमद्भागवत महापुराण का अध्ययन किया !

श्री शुकदेव जी कहते हैं...... सोैनक जी महर्षि वेदव्यास जी ने इस सात्वत संहिता की रचना की तो विचार करने लगे कि इसका उत्तम अधिकारी कौन है उस समय उन्हें अपने पुत्र परमवीत राग श्री सुखदेव जी का स्मरण आया उन्होंने अपने शिष्यों को भागवत के कुछ श्लोक याद कराएं वे व्यास शिष्य वन मे जाते तो भागवत के श्लोकों का गान करते एक दिन वे उसी वन में पहुंचे जहां श्री सुखदेव जी ध्यान में बैठे हुए थे एक शिष्य के मुख से निकला श्लोक |
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