अहो असाधो साधूनां /Ahō asādhō sādhūnāṁ
अहो असाधो साधूनां साधुलिङ्गेन नस्त्वया |
असाध्वकार्यर्भकाणां भिक्षोर्मार्गः प्रदर्शितः ||
( 6.5.36 )
नारद तुमने भेष दो साधुओं का धारण कर रखा है परंतु तुम साधु नहीं असाधु हो तुमने मेरे भोले भाले निरपराध बालकों को भिखारी बना दिया मैं तुम्हें श्राप देता हूं आज से एक स्थान पर अधिक देर तक ठहर नहीं सकोगे, देवर्षि नारद ने उस श्राप को स्वीकार किया इसके पश्चात दक्ष प्रजापति ने 60 कन्यायें उत्पन्न की |अहो असाधो साधूनां /Ahō asādhō sādhūnāṁ
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