रोचक और शिक्षाप्रद कहानियाँ -सबसे बड़ा तप

रोचक और शिक्षाप्रद कहानियाँ -सबसे बड़ा तप

रोचक और शिक्षाप्रद कहानियाँ -सबसे बड़ा तप


महर्षि कश्यप को पुराणों के सभी पाठक जानते हैं। उन्हीं के वंश में एक महात्मा हुए। उनका नाम था पिप्पल! अपनी श्रद्धा और तपस्या से उन्होंने देवताओं को प्रसन्न कर वशीकरण का वरदान प्राप्त कर लिया।


वे जिस व्यक्ति का मन से ध्यान करते, वह उनके वश में हो जाता था। इस बात का उन्हें अभिमान भी बहुत हो गया। वे समझने और कहने भी लगे- “मैं सबसे बड़ा सिद्ध तपस्वी हूँ।"


एक दिन एक सारस आया। पिप्पल से मनुष्य की बोली में उसने कहा-“पिप्पल! तुम ब्राह्मण हो। तुमने बहुत दिन तक कठोर तपस्या की है। मन और इन्द्रियों को वश में रखने के कारण तुम्हें सिद्धि भी प्राप्त हुई है।

रोचक और शिक्षाप्रद कहानियाँ -सबसे बड़ा तप


पर तुम्हारा यह अभिमान करना कि तुमसे बड़ा सिद्ध तपस्वी अन्य कोई नहीं, ठीक नहीं है। सच्ची तपस्या क्या होती है, तुम इसे जानते तक नहीं हो।


तुम यदि यह जानना चाहो तो कुरुक्षेत्र चले जाओ। वहाँ कुण्डल का पुत्र सुकर्मा रहता है। उसके बराबर महाज्ञानी कोई नहीं है। यद्यपि उन्होंने कभी कोई दान, यज्ञ, हवन, पूजा-पाठ आदि नहीं किया है।


न कभी कोई तीर्थयात्रा की है और न किसी देवता की उपासना। फिर भी उन्हें हर विषय का ज्ञान है।"

सारस तो इतना कहकर उड़ गया पर उसकी वाणी की प्रतिध्वनि पिप्पल के मस्तिष्क और कानों में गूंजती रही और वे कुरुक्षेत्र में कुण्डल के आश्रम में जा पहुँचे।


कुण्डल के पुत्र सुकर्मा ने पिप्पल को आते देखा तो विनयपूर्वक आगे बढ़े और हाथ जोड़कर बोले-“मैं कुण्डलकुमार सुकर्मा आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। आइए, पधारिए और आसन सुशोभित कीजिए।"


यह कहकर सुकर्मा ने अतिथि के चरण धोए, फिर विनम्र वाणी में कहा-"आपने तपस्या करके सिद्धि प्राप्त की है। उससे आपको गर्व हो गया है। उस गर्व से छुटकारा पाने के लिए ही यहाँ पधारे हैं।"


यह कहकर वे देवताओं के ध्यान में मग्न हो गये। कुछ समय बाद उन्होंने नेत्र खोले तो तेज से उनका मुख-मण्डल पूरी तरह चमक रहा था।


उस तेजयुक्त मुखमण्डल को देखकर पिप्पल को सारस की कही हुई बात का आभास हो गया। उन्होंने सुकर्मा से पूछा- “सुकर्मा जी, आपकी उम्र अभी थोड़ी है। आपने कोई तपस्या, पूजा-उपासना, तीर्थयात्रा आदि कछ नहीं किया।


दान-दक्षिणा से भी आप दूर ही रहे हैं। फिर कैसे आपको इतना ज्ञान और तेज प्राप्त हो सका? यह जानने की मेरी बड़ी जिज्ञासा है।"


बड़े विनीत स्वर में सुकर्मा ने बताया-"महात्मा जी. मैंने न तो कोई योग साधा. न यज्ञ किया, पूजा-पाठ, तीर्थयात्रा आदि भी कुछ नहीं किया।

 dharmik drishtant / दृष्टान्त महासागर


मेर लिए माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा पुण्य-कार्य है। मैं अपने हाथों से स्वयं ही दोनों के चरण धोता हूँ, उनकी सेवा करता हूँ। इस कार्य में मैं रात-दिन लगा रहता हूँ। इस कार्य में कभी-भी आलस को पास नहीं फटकने देता।


जब तक मेरे माता-पिता जीवित हैं, तब तक उनकी सेवा ही मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है। तप, त्याग, पूजा-पाठ, तीर्थयात्रा आदि मेरे लिए गौण है। माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा पुण्य है। इन सबसे जो फल प्राप्त होता है, माता-पिता की सेवा से वह मुझे प्राप्त हो गया है।


जहाँ माता-पिता निवास करते हैं वहीं पुत्र के लिए सबसे बड़ा तीर्थ है। जो माता-पिता की सेवा करता है, वही सुपुत्र है। ऐसे पुत्र से सभी देवता, गुरुजन तथा परमात्मा प्रसन्न होते हैं।


भोजन-वस्त्र आदि से जो पुत्र माता-पिता को सन्तुष्ट रखता है उसे तपस्या का सच्चा फल प्राप्त हो जाता है। जो पुत्र माता-पिता की सेवा नहीं करता, उसे यज्ञ, जप, तप, पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा या तीर्थयात्रा आदि का फल प्राप्त नहीं हो पाता।"


महात्मा पिप्पल ने प्रश्न किया-“माता-पिता का मृत्यु-काल उपस्थित हो, वे अंगहीन या रोगी हों, तब भी क्या उनकी सेवा करनी चाहिए?"


सकर्मा ने उत्तर दिया-“हाँ, जो पुत्र वृद्ध, अंगहीन तथा महारोगी माता-पिता की सेवा नहीं करता, उनकी उपेक्षा करता, या उन्हें त्याग देता है वह नरकगामी होता है।


जो मूर्ख पुत्र माँ-बाप के बुलाने पर उनके पास नहीं जाता. उनकी आज्ञा का पालन नहीं करता, जो वृद्ध माता-पिता को भोजन कराये बिना, पहले स्वयं भोजन करता है, जो उनको तिरस्कार-भरे वचन बोलता है या उन्हें प्रणाम नहीं करता, उसका कभी उद्धार नहीं होता।"


सुकर्मा के कथन से पिप्पल को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने कहा- “सुकर्मा! तुम्हारा सुकर्मा नाम सार्थक है, क्योंकि तुमने सुकर्मों को ग्रहण किया है।


तम्हारे वचनों से मेरा तप-जनित अभिमान नष्ट हो गया है। तुमको महासे बहुत अधिक ज्ञान है। मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।" यह कहकर पिप्पल अपने निवास स्थान के लिए चले गये।

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