न ध्यातं पदमीश्वरस्य /na dhyatam padmishvarasya shloka vairagya
न ध्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत् संसारविच्छित्तये
स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुर्धर्मोऽपि नोपार्जितः।
नारपीनपयोधरोरुयुगलं स्वप्नेऽपि नाऽऽलिङ्गितं
मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारा वयम्॥११॥
भवबन्धन को काटने के लिए मैंने विधिपूर्वक परमात्मा के चरणों का ध्यान न किया, और न स्वर्ग द्वार के खोलने की कुञ्जी धर्म का उपार्जन ही किया। स्त्री के पुष्ट स्तनों का मर्दन भी न किया, न सघन जांघों का अलिङ्गन ही किया, केवल माता के यौवनरूपी वन को काटने में हम कुठार के रूप में उत्पन्न हुए।
