Hast rekha in hindi हस्त रेखा ज्ञान चित्र सहित हिंदी

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हाथ का आकार-प्रकार

हस्तरेखा के जिज्ञासुओं में यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि वे हाथ के आकार-प्रकार अंगुलियों के गुण, त्वचा की बनावट तथा अंगूठे की स्थिति आदि के सम्पूर्ण परीक्षण की ओर विशेष ध्यान नहीं देते जो कि आवश्यक है। 


वे सीधे रेखाओं और उन पर पाए जाने वाले चिन्हों के विषय में अध्ययन करने लगते हैं । यह सही तरीका नहीं है क्योंकि रेखाओं का और हाथ के चिन्हों के प्रभाव का मूल्यांकन, हम जिस हाथ का परीक्षण कर रहे हैं, उस हाथ के आकार आदि के आधार पर ही हो सकता है ।

हाथ

हाथ का आकार प्रायः शरीर के अन्य अंगों के समान ही होता है। जब हाथ का आकार बड़ा हो, तब उसे बड़ा हाथ कहते हैं। जब छोटा हो तो उसे छोटा हाथ कहते हैं। जब हाथ की लम्बाई मणिबन्ध से उंगली तक अनुपात से ज्यादा लम्बी हो तो उसे लम्बा हाथ कहते हैं। 

जब हथेली की चौड़ाई अंगूठे के नीचे के अनुपात से अधिक हो, तो उसे चौड़ा। हाथ के उस भाग में जो कलाई से जुड़ा होता है अनेक छोटी-छोटी अस्थियां होती हैं जिन्हें 'कारपियल' कहा जाता है। हाथ में पांच लम्बी और सीधी अस्थियां होती है जिनको 'मेटाकारपल' अस्थियां कहते हैं। यही अस्थियां हमारी हथेली की


हाथ में जानने योग्य प्रमुख बातें
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करती हैं। इन करभास्थियों के ऊपर चौदह अगुल्यास्थियां भी होती हैं । अंगूठे में दो तथा चारों अंगुलियों में से प्रत्येक में तीन-तीन अंगुल्यास्थियां होती हैं। 

प्रत्येक अंगुल्यास्थि एक पोरुवे का निर्माण करती है जिस पर्व में नाखून होता है उसे तीसरा पर्व कहते हैं परन्तु हस्तरेखा विज्ञान में जिस पर्व में नाखून होता है उसे प्रथम पर्व और जो हथेली से जुड़ा होता है उसे तीसरा पर्व कहते हैं। करतल उस भाग को कहते हैं जिस पर ग्रहों की सूचना देने वाली रेखाएं होती हैं ।

हाथ की पीठ की तरफ बाल और नाखून होते हैं उसे कर-पृष्ठ कहा जाता है। यह आमतौर से पुरुषों के हाथ के पीछे होते हैं ।

हथेली मणिबन्ध से मध्यमा उंगली के नीचे तक फैली होती है। अगर मध्यमा उंगली हथेली के तीन-चौथाई भाग के बराबर हो तो अंगुलियों का आकार सामान्य समझा जाना चाहिए और अगर मध्यमा उंगली हथेली के तीन-चौथाई भाग से बड़ी हो तो लम्बी समझी जानी चाहिए । अगर वे लम्बाई से छोटी हो तो छोटी समझी जानी चाहिए ।

जब हाथ खोलें तो अंगुलियों की तरफ का भाग ऊपरी भाग कहलाता है और हथेली की तरफ का भाग निचला भाग कहलाता है।

जातक के शरीर में दो हाथ होते हैं । दांई ओर के हाथ को "दक्षिण-हस्त" तथा बाईं ओर के हाथ को “वाम-हस्त” कहते हैं। प्रत्येक हाथ में एक-एक अंगूठा तथा चार चार अंगुलियां होती हैं। अपवाद के रूप में किसी-किसी मनुष्य के हाथ में दो अंगूठे अथवा पांच अंगुलियां भी पाई जाती है। ऐसे लोगों को "छंगा" कहा जाता है ।

चारों अंगुलियों के अलग-अलग नाम हैं। अंगूठे के पास वाली पहली उंगली को 'तर्जनी' कहते हैं । तर्जनी के बगल वाली दूसरी उंगली का नाम 'मध्यमा' है । 

मध्यमा के बगल वाली तीसरी उंगली 'अनामिका' तथा अनामिका के बगल वाली सबसे अन्तिम उंगली 'कनिष्ठिका' के नाम से जानी जाती है। प्रत्येक उंगली में दो गांठें भी होती हैं, जिनके कारण वह तीन भागों में विभक्त होती हैं। इन भागों को "पर्व" के नाम से सम्बोधित किया जाता है ।

- हस्त परीक्षा करते समय सामान्यतः दोनों ही हाथों की परीक्षा करना उचित है । जो लक्षण दोनों हाथों में समान रूप से मिलते हों, उन्हें निर्णायक समझना चाहिए तथा जो लक्षण दोनों हाथों में अलग-अलग किस्म के दिखलायी दें, उनका परिणाम संशयात्मक मानकर दोनों के निष्कर्ष रूप में जो उचित ठहरता हो, उसे ठीक समझना चाहिए। अंगुलियों में नाखून भी रहते हैं जो बराबर बढ़ते रहते हैं। अगर इन्हें कटवाया न जाये तो कई इंच तक लम्बे हो सकते हैं ।

अंगुलियों की भांति अंगूठे में भी तीन पर्व माने गये हैं, परन्तु इसके ऊपरी दो पर्व ही दृष्टिगोचर होते हैं, जिन्हें क्रमशः “उर्ध्वभाग” तथा “अधोभाग" कहा जाता है । 

अंगुलियों तथा अंगूठे के नीचे तथा मणिबन्ध से ऊपर के सम्पूर्ण भाग को करतल कहते हैं । इस हथेली पर ही ग्रहक्षेत्रों की अवस्थिति पाई जाती है। एक प्रकार से हथेली ही जातक के भाग्य का दर्पण होती है । हस्त-परीक्षा का यही मुख्य-साधन है।

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जिस प्रकार संसार में प्रत्येक स्त्री-पुरुष का चेहरा एक दूसरे से अलग होता है, उसी प्रकार प्रत्येक जातक के हाथों की बनावट भी अलग-अलग पाई जाती है। हाथों की बनावट मुख्यतः पांच प्रकार की होती हैं— 
1. छोटा हाथ ।

2. सामान्य छोटा हाथ ।

3. मध्यम आकार वाला हाथ ।

4. बड़े आकार वाला हाथ ।

5. बहुत बड़ा हाथ ।


विद्वानों ने हाथों को सात भागों में बांटा है- ,(1) प्रारम्भिक हाथ, (2) वर्गाकार हाथ, (3) कर्मठ हाथ (4) दार्शनिक हाथ, (5) कलात्मक हाथ, (6) आदर्शवादी हाथ, (7) मिश्रित हाथ । चौक हैं।

प्रारम्भिक हाथ – इस श्रेणी वाले हाथ उन लोगों के पाये जाते हैं, जो मानसिक दृष्टि से अविकसित होते हैं । होते हैं । ऐसे लोगों को बुद्धिहीन, मूर्ख अथवा असभ्य कहा जा सकता है। इस श्रेणी के हाथ की त्वचा हथेली बड़ी भारी तथा बहुत मोटी होती है। अंगुलियां छोटी, बेढंगी, गठीली तथा असुन्दर होती हैं तथा उनके नाखून भी छोटे होते हैं । अंगूठा भी छोटा तथा बहुत मोटा होता है ।

इस श्रेणी के हाथ वाले मनुष्यों का मस्तिष्क कम विकसित होता है। वे तामसी प्रकृति के कुतर्क, धोखे-बाज, मिथ्यावादी, भीरु, झगड़ालू, दुस्साहसी तथा बेवकूफ होते हैं। खाना, पीना, सोना ही उनके जीवन का उद्देश्य होता है। ये तार्किक नहीं हो पाते। अपने से अधिक साहसी तथा तेजस्वी व्यक्ति के समक्ष कांपने लगते हैं। इन्हें अपने भले-बुरे की पहचान नहीं होती । इन्हें बहला-फुसला कर बेवकूफ भी बनाया जा सकता है।

इस प्रकार के हाथ प्रायः चोर-डाकू, मजदूर तथा किसान वर्ग के लोगों में अधिक पाये जाते हैं ।

- वर्गाकार हाथ – इस श्रेणी के हाथों की बनावट चौकोर होती है। हथेली जितनी लम्बी होती है, प्रायः उतनी ही चौड़ी भी होती है। अंगुलियां पतली तथा ऊपर से चौकोर होती हैं। नाखून भी प्रायः चौकोर तथा छोटे होते हैं। हथेली का रंग गुलाबी होता है ।

ऐसे हाथ वाले जातक मौलिकतावादी एवं व्यावहारिक होते हैं। ये लोग स्वार्थ-दर से ही संबंध स्थापित  हैं।   करने वाले होते हैं तथा इनमें कल्पना शक्ति की कमी नहीं होती है ।

यह केवल परिश्रम के बल पर विद्वानों से अधिक सफलता प्राप्त करते हैं । ये लोग किसी प्रकार का प्रदर्शन न करके अपना काम चुपचाप करते रहते हैं । इनकी उन्नति का यही रहस्य होता है ।

 ये लोग स्वभाव के बेहद रूखे होते हैं । - 

कर्मठ हाथ - इस श्रेणी के हाथ कुरुप से दिखलाई देते - हैं। हथेली की गद्दियां मांसल होती हैं। इनकी अंगुलियों के अग्रभाग चम्मच की भांति फैले रहते हैं तथा हथेली भी फैली हुई सी प्रतीत होती है। 

इस श्रेणी के हाथ को कर्मठ हाथ कहते हैं । इस श्रेणी के हाथ की अंगुलियां लम्बी और पुष्ट होती हैं। इस श्रेणी का हाथ अगर कठोर तथा मजबूत हो तो वह जातक जोशीला होता है । 

मन पर नियंत्रण कर पाना उसके लिए कठिन होता है । इसके विपरीत अगर हाथ मुलायम, मांसल तथा ढीलापन लिये हो तो जातक अस्थिर एवं चिड़चिड़े स्वभाव का होता है। 

ऐसे लोग समाज कल्याण में बढ़ चढ़कर भाग लेते हैं। कर्मठता इनका विशेष गुण होता है तथा उसी के बल पर ये धन, सम्मान तथा यश भी अर्जित करते हैं। अगर हथेली मणिबन्ध के समीप अधिक फैली हो तो ऐसे लोग नसिक क्षेत्र में अपनी बुद्धि का उपयोग करते हैं। ऐसे लोग धनोपार्जन के क्षेत्र में प्रायः पिछड़े रह जाते हैं ।

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दार्शनिक हाथ — इन हाथों की हथेली लम्बी होती है हाथ की बनावट भी लम्बी होती है। अंगुलियां कुछ टेढ़ी होती हैं। उनकी गांठें उठी रहती हैं तथा नाखून भी लम्बे होते हैं। 

ऐसा हाथ एक ओर को कुछ झुका-सा रहता है तथा उस पर रेखाएं अधिक गहरी होती हैं। ऐसे हाथ वाले जातक विद्वान, बुद्धिजीवी, धैर्यवान, मितभाषी, ज्ञान-पिपासु होते हैं। स्वयं कष्ट सहकर भी ये दूसरों को सुख पहुंचाने के इच्छुक रहते हैं। इन्हें धौंस दिखाकर कोई काम नहीं कराया जा सकता है ।

इन लोगों का दाम्पत्य जीवन सुखमय नहीं होता है ।

कलात्मक हाथ – इस श्रेणी के हाथ की बनावट सुन्दर मानी जाती है। त्वचा कोमल होती है। अंगुलियां अपने उद्गम स्थान पर पुष्ट होती हैं तथा आगे पतली होती चली जाती है। रंग गुलाबी होता है। ऐसे हाथ वाले जातक सौन्दर्य के प्रति रुझान रखने वाले, कला प्रेमी, विलासी होते हैं । 

ये लोग शारीरिक परिश्रम करने से घबराते हैं। अपने सम्पर्क में आने वाले लोगों से शीघ्र प्रभावित हो जाने के कारण धोखा खाते हैं। इनमें यश प्राप्ति की आकांक्षा नहीं पाई जाती है। आलस्य तथा फिजूलखर्ची के कारण इन लोगों के पारिवारिक जीवन की सुख-शान्ति नष्ट हो जाती है। ये लोग मन में उमंग उठते ही कार्य में जुट जाते हैं और उसके परिणाम की चिन्ता नहीं करते ।

धैर्य, परिश्रम की कमी के कारण इनके संकल्प पूर्ण नहीं हो पाते। अधीर स्वभाव के होने के कारण इनकी मैत्री स्थायी नहीं बन पाती । व्यापारिक दृष्टि से ऐसा हाथ शुभ नहीं माना जाता ।

आदर्शवादी हाथ – इस श्रेणी के हाथ का गठन सुन्दर होता है । वह गुलाबी रंग की त्वचा वाला तथा लम्बी, पतली अंगुलियों से संयुक्त रहता है। नाखून भी लम्बे तथा आकर्षक होते हैं ।

ऐसे हाथ वाले जातक संगीतज्ञ, चित्रकार, अभिनेता होते हैं। वे उदार स्वभाव के होते हैं। प्रसिद्धि से दूर रहना इन्हें रुचिकर होता है। दूसरों से शीघ्र प्रभावित हो जाने की प्रवृत्ति के कारण इन्हें जीवन में हानि उठानी पड़ती है ।

जीवन संघर्ष में ऐसे जातक पिछड़े रहते हैं। कुछ विद्वानों के मतानुसार ऐसे हाथ वाले जातक विश्वास पात्र नहीं होते तथा दूसरों से धन ठगने में कुशल होते हैं । 

मिश्रित हाथ- - पूर्वोक्त हाथों में से दो अथवा अधिक प्रकार के हाथों के लक्षण जिस एक हाथ में पाये जायें, उसे ‘मिश्रित हाथ’ समझना चाहिए । 

मिश्रित हाथों में हथेली किसी एक वर्ग की तथा अंगुलियां दूसरे वर्ग की होती हैं। विभिन्न वर्गों का मिश्रण होने के कारण मिश्रित हाथों वाले जातक के स्वभाव तथा चरित्र में भी अन्तर पाया जाता है। मिश्रित हाथ वाले जातक बातचीत करने में तेज तथा तीक्ष्ण बुद्धि वाले तथा सहृदय होते हैं । हाथों की बनावट और उसकी श्रेणियों के अनुरूप ही जातक के गुण, कर्म, स्वभाव, कार्य आदि का पता चलता है। आप उपरोक्त विवरण को सावधानी पूर्वक पढ़ें और अध्ययन का श्री गणेश करें ।

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