Bhagwat katha भागवत कथा दशम स्कंध भाग-4

 श्रीमद्भागवत महापुराण साप्ताहिक कथा
श्रीमद्भागवत महापुराण सप्ताहिक कथा Bhagwat Katha story in hindi
भागवत कथा दशम स्कंध,भाग-4
कालेन व्रजताल्पेन गोकुले रामकेशवौ। 
जानुभ्यां सह पाणिभ्यां रिंगमाणौ विजह्रतु:।। १०/८/२१
जब भगवान श्री कृष्ण और बलराम कुछ बड़े हो गए तो घुटनों के बल घिसटते हुए चलने लगे एक दिन घिसटते घिसटते गोकुल के कीचड़ में पहुंच गए और कीचड़ में में स्नान करने लगे |

पंकाभिषिक्त सकलावयवं विलोक्यं दामोदरं वदति कोपवशात्य शोदा ।
त्वं सूकरोऽसि गतजन्मनि पूतनारे इत्यक्तिसंस्मित मुखोऽवतु नो मुरारे।। 

( भगवान की बाल लीलाएं )

मैया यशोदा ने कन्हैया को इस हाल में देखा तो क्रोधित हो कहा क्यों रे पूतना के शत्रु क्यों रे पूतना को मारने वाला तू पूर्व जन्म में शूकर था क्या , कन्हैया ने सोचा मैया को कैसे मालूम कि मैं पूर्व जन्म में शूकर था, कन्हैया ने  सिर हिलाते हुए कहा हां मैया मैं शूकर था |

मैया ने कन्हैया के इस लीला को देखा तो हृदय से लगा लिया | उन्हें स्नान कराया अच्छे-अच्छे वस्त्र पहनाए, एक दिन नंदागण में एक सुंदर सा बछड़ा बैठा हुआ था कन्हैया धीरे-धीरे उसके पास गए और उसकी पूंछ पकड़ ली जिससे वह बछड़ा उठकर भागा |

कन्हैया उसकी पूंछ में लटक गए जोर-जोर से आवाज लगाई मैया बचाओ मैया बचाओ, कन्हैया को इस हाल में मैया ने देखा तो कहा कन्हैया छोड़ छोड़ , कन्हैया ने सोचा मैया धोती छोड़ने के लिए कह रही है कन्हैया ने धोती छोर दी  इतने पर  भी वह बछड़ा नहीं रुका तो, कन्हैया अपनी लंगोट भी छोड़ दी | नंगम नंगा हो गए फिर मैया ने जैसे तैसे बछड़े को रोका |

एक दिन एक सुनार गोकुल में आया हुआ था जब वह कहीं चला गया कृष्ण और बलराम वहां आए और उसकी फुकनी में आग फूंकने लगे जब आग की चिंगारी शरीर पर पड़ी तो वहां से दोनों भागे |

एक दिन नंद बाबा के आंगन में एक सुंदर सा कुत्ता आ गया कन्हैया उस कुत्ते के पास पहुंच गए कुत्ते के मुंह में अपनी उंगली डाल दी मैया ने सोचा कहीं यह कुत्ता कन्हैया को काट ना ले दौड़ी-दौड़ी गई कुत्ते को वहां से भगाया |

एक दिन कृष्ण और बलराम घसिटते-घसिटते पानी के हौद के पास पहुंच गए और उसमें कूद पड़े जब से डूबने और उतराने लगे तो जोरों से आवाज लगाई मैया बचाओ मैया बचाओ मैया तुरंत आई और उन्हें पानी के बाहर निकाला |

एक दिन आंगन में एक मोर आया कन्हैया धीरे से उसके पास गए और उसके ऊपर बैठ गए वह मोर कन्हैया को लेकर आकाश में उड़ गया मैया ने जैसे तैसे कन्हैया को ऊपर से नीचे उतारा| इस प्रकार कृष्ण और बलराम अनेकों लीलाएं करते, जिसके कारण मैया यशोदा का घर का काम धंधा नहीं हो पाता|वे कृष्ण और बलराम को ही देखती रहती|

एक दिन एक गोपी दौड़ी दौड़ी आई सारी सखियों को एकत्रित किया और कहा

श्रृणु सखि कौतुक मेकं नन्द निकेतांगणे मयादृष्टं। 
गोधूलि धूसरितांग: नृत्यति वेदान्त सिध्दान्त।। 
अरी सखियों आज मैंने नंद बाबा के आंगन में गोधूलि से धूसरित वेदांत के सिद्धांत रूप श्री कृष्ण को नृत्य करते हुए देखा | जब गोपियों ने श्रीकृष्ण की इस छवि का वर्णन सुना तो प्रार्थना करने लगी | हे प्रभु ,श्री कृष्ण हमारे घर कब आएंगे कब हम पर कृपा करेंगे |

भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के इस भाव को समझ गए कुछ और बड़े हुए सारे मित्रों को एकत्रित किया और बाल गोपाल चोर विद्या प्रचार मंडल का गठन किया | कन्हैया ने ग्वाल बालों से कहा मित्रों हमारे घर जो भी माखन दही होता है वह सब मथुरा चला जाता है जिसे खाकर मथुरा वासी पहलवान हो रहे हैं |

इसलिए हम सभी मिलकर माखन की चोरी करेंगे | ग्वाल बालों ने कहा कन्हैया यदि पकड़े गए तो, कन्हैया ने कहा सबसे पहले सब अपने अपने घर में चोरी का अभ्यास करेंगे | कन्हैया ऐसा कह अपने घर पर लौट आए एकांत में दही माखन के कक्ष में पहुंच गए-

सून्ये चोरयत: स्वयं निजगृहे हैयंगवीनं मणिस् तम्भे स्वप्रतिविम्ब मीक्षितवतस्तेनैव सार्ध्दं भिया।
भ्रातर्मा वद मातरं मम समो भागस्तवा पीहितो भुड्क्ष्वेत्यालपतो हरे: कलवचोमात्रा रह: श्रूयते
वहां जैसे ही मणिमय स्तंभ में अपनी परछाई को देखा डर गए, कहा  भैया मैया से मत कहियो जामे तेरो भी भाग है ,आ खाले | मैया ने जैसे ही कन्हैया की बात को सुना कहा कन्हैया क्या कर रहे हो | कन्हैया ने कहा-

मात: क एष नवनीत मिद त्वदीयं लोभेन चोरयितु मद्य गृहं प्रविष्ट:।
मद्वारणं न मनुते मयि रोषभाजि रोषं तनोति न हि मे नवनीत लोभ:।।
मैया देखो घर में चोर घुस आया है, जब मैं इसे मना करता हूं तो यह मानता नहीं और इस पर क्रोध है करता हूं तो यह भी बदले में मुझे क्रोध  दिखा रहा है|और मैया तू मोपै संदेह मत करियो, मोये माखन को लोभ नाय| मैया ने कन्हैया को हृदय से लगा लिया, जब मैया कहीं गई हुई थी, कन्हैया फिर से माखन के कक्ष में पहुंच गए| इतने में मैया लौट आयी कन्हैया दिखाई नहीं दिए तो पुकारने लगी |

कृष्णक्वासि करोषि किं पितरिति श्रुत्वैव मातुर्वच: साशड्कं नवनीत चौर्यविरतो विश्रभ्य तामब्रवीत् ।
मात: कंकण पद्मराग  महसा पाणिर्ममातप्यते तेनायं नवनीत भाण्ड विवरे विन्यस्य निर्वापित:।।

अरे ओ कन्हैया, कहां हो| इतने पर भी जब कन्हैया ने प्रत्युत्तर नहीं दिया तो मैया ने कहा अरे ओ मेरे बाप कन्हैया क्या कर रहा है| कन्हैया ने जैसे ही मैया की आवाज सुनी दही माखन के मटके से हाथ बाहर निकाल लिया, कहा मैंया आपने जो मेरे हाथ में पद्मराग मणि के कंगन पहना रखा है उससे मेरे हाथ जल रहे थे, उन्हीं को ठंडा करने के लिए मैंने अपने हाथ को दधी के मटके में डाल दिए |

मैया ने कहा कन्हैया यह मुख में कहां से माखन लग गया | कन्हैया ने कहा मैया एक चींटी आई और मेरे पैर से चढ़ी और मुंह के पास चली आई जब मैंने उसे हाथों से हटाया तो मुख में भी माखन लग गया| मैया ने कन्हैया की चतुराई को देखा तो प्रसन्न हो गई|

एक दिन कई गोपियां श्रीकृष्ण की शिकायत करने मैया यशोदा के पास आयी|

वत्सान् मुञ्चन् क्वचिदसमये क्रोशसंजात हास: स्तेयं स्वाद्वत्त्यथ दधि पय: कल्पितै: स्तेययोगै:।
मर्कान् भोक्ष्यन् विभजति स चेन्नात्ति भाण्डं भिनत्ति,द्रव्यालाभे स गृहकुपितो यात्युपक्रोश्य तोकान्।१०/८/२९
एक गोपी कहती है मैया तेरो लाल हमारे बछड़ा है छोड़ देह, मैया ने कहा गोपी यह तो अच्छी बात है मेरो लाला तुम्हारी सहायता करै, गोपी कहती है मैया जब गाय दूहने का समय नहीं होता तब यह बछड़ों को छोड़ देता है, जिससे बछड़ा गाय को सबरो दूध पी जाए |

मैया ने कहा देख गोपी जैसे मेरो लाला तैसे तेरे भी लाला है जे जाको तू डांट दियो कर | गोपी ने कहा मैया जब हम इसको क्रोध दिखाती है तो यह भी हमे क्रोध दिखाता है और ठठा ठठाकर हंसता है और भाग जाता है |दूसरी गोपी कहती है मैया|

एक दिन कान्हा मेरे पास आया और कहा गोपी अयोध्या से बड़े-बड़े संत पधारे हैं तेरे पास जो भी  माखन है उसे लेकर चल , जब मैं बाहर आई तो  वहां पर पात की पात  बंदरन की बैठी भई |मैंने कहा कान्हा संत कहां है तो कहने लगा गोपी तेरी का दोनों आंख फूट गई |

अरे  इनते बड़े दूसरों कौन संत होगो,  त्रेतायुग में इन्होंने भगवान राम की बहुत सहायता करी | ऐसा कह कन्हैया ने सारा माखन बानरों को खिला दिया जब बंदरों का पेट भर गया और उन्होंने खाना बंद कर दिया तो कन्हैया ने कहा गोपी तेरे माखन सर गयो है, जाए मारे बंदर नाय खा रहे |ऐसा कह कन्हैया ने मेरे सारे माट मटका फोड दिये |

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