shiv puran hindi me शिव पुराण हिंदी में
फिर स्तुति करने लगे तब प्रसन्न होकर शिव जी बोले- तुम्हारे
कहने पर ही देवर्षि पार्वती जी ने उग्र तपस्या की थी । जिसके फलस्वरूप प्रसन्न
होकर में उसे पति होने का वर दे चुका हूं । अब विवाह के लिए वहां से लग्न पत्रिका
भी आ चुकी है। आज से सातवें दिन श्री पार्वती जी के साथ लोक रीति के अनुसार मेरा
शुभ विवाह होगा। अब तुम-
विष्णु प्रभृतिदेवांश्च मुनीन सिद्धानपि ध्रुवम्।
त्वं निमन्त्रय मद्वाण्या मुने५न्यानपि सर्वतः।। रु•पा•39-21
मेरी ओर से विष्णु आदि देवों, मुनियों,सिद्धों तथा
अन्य लोगों को भी चारों ओर निमंत्रण दीजिए। मेरी आज्ञा को मानते हुए सभी लोग
उत्साह तथा शोभा से युक्त होकर अपनी स्त्री, पुत्र तथा गणों
सहित विवाह में आएं।
इस प्रकार भगवान की आज्ञा सुनकर नारदजी बहुत प्रसन्न हुए कहने लगे
भगवान मैं आपका सेवक हूं, आपकी आज्ञा शिरोधार्य है । यह कहकर
देवताओं को निमंत्रण करने के लिए चल पड़े । सभी देवताओं को जाकर निमंत्रण देकर
प्रसन्नता पूर्वक लौट आए ।
shiv puran hindi me शिव पुराण हिंदी में
आकर सभी सभी समाचार सुनाया। निमंत्रण पाकर प्रसन्नता के साथ-
आजगामच्युतः शीघ्रं कैलासं सपरिच्छदः।
सज धज कर भगवान विष्णु श्री लक्ष्मी जी के साथ भगवान शंकर के पास पहुंच गए। वह
शंकर को प्रणाम करके उनकी आज्ञा से अपने स्थान पर बैठ गए।
इसी प्रकार सब देवता, लोकपाल, इंद्र आदि अपने गण तथा परिवार के साथ वस्त्र आभूषणों से शोभायमान होकर
वहां पहुंच गए। सिद्ध, चारण, गंधर्व ,ऋषि, मुनि सब निमन्त्रित होकर कैलाश पहुंच गए।
अप्सराएं नाचने लगीं, देव नारियाँ मंगल गान
करने लगी । लोकाचार रीतियाँ करके भगवान शंकर की आज्ञा से विष्णु आदि सभी देवता
बरात ले जाने की तैयारी करने लगे ।
परमेश्वर प्रभु की इच्छा से ही उनके स्वाभाविक वेष को भूषणों से
सजाया गया। नाना रत्नों से देदीप्यमान दो सर्प दोनों कानों को अलंकृत करने वाले
कुंडल के रूप में शोभित हुए। सात माताओं ने शिव जी का श्रंगार किया।
मस्तक पर तीसरा नेत्र मुकुट बन गया । चंद्रकला का तिलक लगाया गया ।
अंगों से सर्प लिपटकर आभूषण बन गए। सारे अंगों पर चिता की भष्म रमा दी गई वह चमक
उठी ।
वस्त्र के स्थान पर सिंह तथा गज चर्म शोभायमान हो गया। इस प्रकार के
श्रृंगार से सुशोभित होकर भगवान शंकर दूल्हा बने । उस समय शिव जी का ऐसा सुन्दर
रूप हो गया जो अवर्णनीय था ।
विष्णु जी कहने लगे-
देवदेव महादेव शरणागत वत्सल।
कार्य कर्ता स्वभक्तानां विज्ञप्ति शृणु मे प्रभो।। रु•पा•39-46
shiv puran hindi me शिव पुराण हिंदी में
हे देव देव- महादेव , हे शरणागत वत्सल आप अपने भक्तों का मनोरथ
पूर्ण करने वाले हैं। हे शंकर जी आप अपना गृह सूत्र की विधि के अनुसार विवाह करें।
मंडप स्थापन, नान्दीमुखी श्राद्धादि कुलरीति से करते चलें
इसमें आपका यश होगा और लोग भी इसी प्रकार करने लग जाएंगे ।
यह सुनकर महादेव जी ने स्वीकार करके कश्यप, अत्रि,
वशिष्ट, गौतम, गुरु
बृहस्पति, शक्ति, जमदग्नि, पराशर, मारकंडेय, अगस्त,
च्यवन, गर्ग, शिलापाक,
दधीचि, उपमन्यु, भरद्वाज,
पिप्पलाद, कौशिक, कौत्स
इत्यादि ऋषि मुनियों को शिष्यो के साथ बुलाकर सभी लोकरीतियां कराने की आज्ञा दे
दी।
तब तो सब ने मिलकर भगवान शंकर की रक्षा विधान करके ऋग्वेद, यजुर्वेद द्वारा स्वस्तिवाचन किया । फिर विघ्न निवारणार्थ ग्रह पूजन मंडप
में आए हुए देवताओं के पूजन कराए। इसी प्रकार और भी वैदिक विधि के अनुसार सभी मंगल
कार्य करा दिए। इन सब के हो जाने पर श्री महादेव ने-
लौकिकं वैदिकं कर्म ननाम च मुदा द्विजान्।
लौकिक कुलाचार तथा वैदिक विधि का संपादन कर प्रसन्नता पूर्वक ब्राह्मणों को
प्रणाम किया । उसके बाद देवताओं और ब्राह्मणों को आगे कर सर्वेश्वर शिव जी अपने
पर्वत्तोत्तम कैलाश से प्रशन्नता पूर्वक चले।
shiv puran hindi me शिव पुराण हिंदी में
देवताओं ने उस समय महेश की प्रसन्नता के लिए अनेक प्रकार के गाने
बजाने तथा नृत्य संबंधी अनेक प्रकार के उत्सव किए।
कर त्रिशूल अरु डमरू बिराजा, चले बसहं चढ़ि बाजहिं बाजा ।।
देखि सिवहिं सुरत्रिय मुसुकाहीं, बर लायक
दुलहिन जग नाहीं।।
शिवजी के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सुशोभित है, शिवजी बैल पर चढ़कर चल रहे हैं। बाजे बज रहे हैं । शिव जी को देखकर
देवांगनाए मुस्कुरा रही हैं और कहती है कि इस वर के योग्य दुल्हन संसार में नहीं
मिलेगी।
विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओं के समूह अपने अपने विमान पर चढ़कर
बरात चलें। देवताओं का समाज सब प्रकार से अनुपम परम सुंदर था पर दूल्हे के योग्य
बरात ना थी ।
तब विष्णु भगवान ने सब दिक्पालों से हंसकर कहा- सब लोग अपने अपने दल
समेत अलग अलग होकर चलो। हे भाई हम लोगों की यह बरात वर के योग्य नहीं है । क्या
पराए नगर में जाकर हंसी करवावोगे? विष्णु भगवान की बात सुनकर
देवता मुस्कुराए और अपनी अपनी सेना से अलग हो गए ।
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं, हरि के व्यंग बचन नहिं जाहीं।
अतिप्रिय बचन सुनत प्रियकेरे, भृगंहि प्रेरि
सकल गन टेरे।।
महादेव जी यह देखकर मन ही मन मुस्कुराते हैं कि विष्णु जी के व्यंग वचन छूटते
नहीं, अपने प्यारे विष्णु जी के प्रिय वचन सुनकर शिवजी ने भृंगी को भेजकर अपने
सब गणों को बुलवा लिया।
shiv puran hindi me शिव पुराण हिंदी में
अभ्यगाच्छंखकर्णश्च गणकोट्या गणेश्वरः।
उसी समय गणों का स्वामी शंखकर्ण करोड़ों गण के साथ बरात में चल दिया। केकराक्ष
ने दस करोड़ गण ,विस्टम्भ तथा विकृत के 60 करोड़ गण। दो करोड़ गण विशाख ने। चार करोड़ गण पारिजात ने। नौ करोड़
सवर्तिक तथा विक्रतानन ने 60 करोड़ गण के साथ चला।
वीरभद्र चौंसठ हजार गण लेकर चले। नंदी, क्षेत्रपाल
,भैरव आदि ने भी असंख्य गणों को साथ लेकर के भगवान शंकर के
विवाह उत्सव में चल दिए।
कोउ मुख हीन बिपुल मुख काहू। बिनु पदकर कोउ बहु पद बाहू।।
बिपुल नयन कोऊ नयन बिहीना। रिष्ट पुष्ट कोउ अति तन खीना।।
कोई गण बिना मुंह का है, किसी के बहुत से मुख हैं, कोई बिना हाथ पैर का है, तो किसी के कई हाथ पैर हैं।
किसी के बहुत आंखे हैं तो किसी की एक भी आंख नहीं है । कोई बहुत मोटा ताजा है तो
कोई बहुत दुबला पतला है।
तन कीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।
भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें।।
खर स्वान सुअर सृकाल मुखगन वेष अगनित को गनै।
बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै।।
कोई बहुत दुबला है, कोई बहुत मोटा ,कोई
पवित्र कोई अपवित्र वेश धारण किए हुए हैं। भयंकर गहने पहने ,हाथ
में कपाल लिए हैं और सब के सब शरीर में ताजा खून लपेटे हुए हैं।
गधे, कुत्ते ,सूअर और
सियार के से उनके मुख हैं। गणों के अगणित वेशों को कौन गिने ? बहुत प्रकार के प्रेत ,पिशाच ,योगिनियों
की जमाते हैं। उनका वर्णन करते नहीं बनता । इस प्रकार शिवजी की बारात चली।