Bhagwat mhapuran katha in hindi PDF षष्ठम स्कन्ध भाग-1

भागवत महापुराण साप्ताहिक कथा 
षष्ठम स्कन्ध, भाग-1
श्रीमद्भागवत महापुराण सप्ताहिक कथा Bhagwat Katha story in hindi
राजा परीक्षित ने अनेकों यातनाओं से पूर्ण नरकों का वर्णन सुना तो कुछ भयभीत हो गए और श्री सुखदेव जी से पूछा प्रभु ऐसा कोई उपाय बताएं जिसको करने से यम यातना के दुखों को ना भोगना पड़े , प्राणी नरकों में जाने से बच सके।

श्री सुखदेव जी ने कहा परीक्षित मनुष्य मन वाणी और शरीर से पाप करता है यदि वह इसी जन्म में उन पापों का प्रायश्चित कर ले तो उसे नरकों में नहीं जाना पड़ता जैसे रेल यात्रा कर रहे हो टिकट ना हो तो जुर्माना देने से जेल में नहीं जाना पड़ता | 

राजा परीक्षित ने कहा प्रभु मनुष्यों से जाने अनजाने में ना जाने कितने पाप हो जाते जाते हैं वह पाप करेगा पाप के बाद प्रयश्चित करेगा प्रायश्चित के बाद पुनः पाप करेगा और प्रायश्चित करेगा तो उसका प्रायश्चित तो हाथी के स्नान के समान व्यर्थ हैं |

जैसे हाथी जल में स्नान करता है और जल से बाहर निकलकर पुनः अपने ऊपर धूल डाल लेता है इस विषय में क्या करना चाहिए |

श्री सुखदेव जी ने कहा परीक्षित कर्मों के द्वारा कर्मों का अत्यान्तिक नाश नहीं होता जो भगवान के भक्त होते हैं वह जैसे सूर्य अपनी किरणों से कोहरे को नष्ट कर देता है उसी प्रकार भक्ति के द्वारा भगवान संपूर्ण पाप राशि को भस्म कर देते हैं |

सकृन्मनः कृष्णपदारविन्दयो-
          र्निवेशितं तद्गुणरागि यैरिह |
न ते यमं पाशभृतश्च तद्भटान्
          स्वप्नेपि पश्यन्ति हि चीर्णनिष्कृताः ||
जिनके मनरूपी मघुर-मधुकर एक बार भी भगवान श्री कृष्ण के चरणारविंद रूपी मकरंद का पान कर लिया उन्होंने संपूर्ण प्रायश्चित कर लिया उन्हें स्वप्न में भी यमराज और उनके दूतों का दर्शन नहीं होता, इस विषय में मैं तुम्हें एक इतिहास सुनाता हूं |
भागवत कथा- अजामिल उपाख्यान 
कानकुब्ज नगर ( कन्नौज ) में एक अजामिल नाम का ब्राह्मण रहता था |
ब्रह्मेन न मिलति अजया मायया मिलति अजामिलः ||
जो ब्रह्म से तो ना मिले परंतु माया से मिल जाए उसे अजामिल कहते हैं वह अजामिल त्रिकाल संध्या करता माता पिता की सेवा करता अग्निहोत्र करता एक दिन हवन के लिए समिधा लेने वन में गया हुआ था मार्ग में उसने एक वैश्या को देखा जिसे देख उसमे इतना आसक्त हुआ संध्या करता तो उसे वही दिखाई देती पूजा करता यज्ञ करता सभी जगह उसे वही वही दिखती उसे पाने के लिए वह अजामिल अपनी सारी संपत्ति बेच दी, माता-पिता पत्नी का त्याग कर दिया और उसे प्राप्त कर लिया उसके पोषण के लिए चोरी करता डकैती डालता आने जाने वाले राहगीरों को मारता उन्हें लूट लेता |

उस वैश्या से इसके 9 पुत्र हुए दशमा पुत्र जब गर्भ में था इसी समय भगवान के अनुग्रह स्वरूप कुछ महात्माओं की टोली इलाहाबाद तीर्थराज प्रयाग जा रही थी जब कन्नौज आया शाम हो गई उन्होंने उसी गांव में विश्राम करने का विचार बनाया खेलते हुए बालकों से पूछां यहां कोई सदाचारी ब्राह्मण का घर है जिसके यहां हम भिक्षा ले सकें बालकों ने चंचलता बस अजामिल का घर बता दिया, अजामिल उस समय कहीं बाहर गया हुआ था महात्माओं ने बाहर से आवाज लगाई |

भिक्षां देहि जय श्री राम जय श्रीमन्नारायण जय श्री कृष्ण, महात्माओं की आवाज सुन वह वैश्या बाहर निकली दूर से ही महात्माओं को प्रणाम किया कहा बाबा आप लोगों का यहां कैसे आना हुआ महात्माओं ने कहा हम आज भक्त अजामिल के यहां भिक्षा करना चाहते हैं इसलिए हम यहां आए हुए हैं वैश्या ने कहा यह भक्त अजामिल का घर नहीं पतित अजामिल का घर है आप यहां से चले जाओ यदि मेरे पति ने आप लोगों को देख लिया तो मार डालेगा |

महात्माओं ने कहा देवी हमने भिक्षा लेने का निश्चय कर लिया है इसलिए भिक्षा तो हम आज यही कि करेंगे वैश्या ने महात्माओं के दृण संकल्प को देखा उनकी निर्भीकता को देखा तो उसका ह्रदय बदल गया कच्चा सीधा लेकर आई महात्माओं को दिया महात्माओं ने भगवान के लिए प्रसाद तैयार किया भोग लगाया दो थाली अजामिल के यहां भेजी संतों की पंगत लगी कीर्तन हुआ जयकारा लगा सभी संतो ने प्रसाद पाया और सो गये रात्रि में जब अजामिल आया उसने अनेकों महात्माओं को देखा तो कहने लगा अरे मैं तो वहां भटक रहा था असली माल तो संतो के पास ही होता है |

उन टको लूटने के लिए चल पड़ा अजामिल दुनिया को डराता था परंतु अपनी पत्नी से बहुत डरता था जैसे ही उस वैश्या ने आंख दिखाई अजामिल वहीं बैठ गया प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में संत जागे स्नान किया संध्या की और अजामिल के यहां पहुंचकर का देवी भिक्षा हो गई अब हम जा रहे हैं हमें दक्षिणा दे दो अजामिल ने कहा आप लोगों का दंड कमंडल सुरक्षित है यही सबसे बड़ी दक्षिणा है चले जाओ अन्यथा इसे भी छीन लूंगा |

महात्माओं ने कहा यजमान हमें तुमसे यही दक्षिणा चाहिए कि तुम्हारे यहां जो संतान हो उसका नाम नारायण रखना संत चले गए समय आने पर अजामिल के एक पुत्र हुआ वैश्या को संतों की वाणी स्मरण हुआ उसने अपने बेटे का नाम नारायण रखा अजामिल अपने छोटे बेटे से अत्यधिक प्रेम करता था हमेशा उसका ही स्मरण करता नारायण पानी पी लो, नारायण भोजन कर लो, नारायण इधर आओ नारायण उधर जाओ, नारायण यह कर लो नारायण वह कर लो।

अजामिल की अवस्था अब 88 वर्ष की हो गई जब मृत्यु का समय आया उसके सामने यमराज के तीन दूत हाथ में फांसी का फंदा लेकर प्रकट हो गये अजामिल ने भयानक दूतों को देखा तो घबरा गया चिल्लाने लगा नारायण बचाओ नारायण बचाओ भगवान ने जब यह सुना अपने पार्षदों से कहा आप लोग जाओ मेरा भक्त अजामिल मुझे पुकार रहा है उसे बचाओ पार्षदों ने कहा प्रभु वह आप को नहीं अपने पुत्र को पुकार रहा है |

भगवान नारायण ने कहा पहले नारायण नाम मेरा है उसका पुत्र तो बाद में पैदा हुआ है वह मुझे ही पुकार रहा है जाओ उसकी रक्षा करो |

भगवान की इस आज्ञा को पाकर भगवान के पार्षद दौड़े-दौड़े आये यम दूतों को धक्का दिया अजामिल को मुक्त कराया यमदूत ने कहा हमें रोकने वाले तुम कौन हो विष्णु दूतों ने कहा पहले यह बताओ तुम कौन हो यमदूतों ने कहा हम धर्मराज के सेवक हैं उन्हीं की आज्ञा के कारण इस अजामिल को लेने आए हैं | विष्णु दूतों ने कहा यदि तुम धर्मराज के सेवक हो तो बताओ धर्म किसे कहते हैं | यमदूतों ने कहा---
वेद प्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः |
वेदो नारायणः साक्षातस्वयम्भूरिति शुश्रुम् ||
वेद विहितत्त्वं धर्मत्वं वेद निषिधत्त्वं अधर्मत्वं || वेद जिसका विधान करता है उसे धर्म कहते हैं और जिसका निषेध करता है उसे अधर्म कहते हैं वेद साक्षात् भगवान नारायण के स्वरूप हैं उनके स्वास् प्रश्वास से प्रगट हुए हैं भगवान के पार्षदों ने कहा यमदूतों जब वेद साक्षात् भगवान नारायण के स्वरूप है तो अजामिल ने मरते समय उन्हीं नारायण का तो नाम उच्चारण किया है जिससे इसके करोडो जन्म के पापों का प्रायश्चित हो
 गया |
पतितः स्खलितो भग्नः सन्दष्टस्तप्त आहतः |
हरिरित्यवशेनाहं   पुमान्नार्ह्रति   यातनाम्  ||
गिरते समय अंग भंग होने पर और सर्प अदि के डसने पर भी कोई विवसता पूर्वक भगवान का नाम ले लेता है तो वह यम यात्रा का पात्र नहीं होता , जैसे अग्नि का स्पर्श कोई जानकार करें अथवा अनजान में करें अग्नि उसे जला देती है उसी प्रकार भगवान का नाम कोई जानकर अथवा अनजान मे ले पवित्र हो जाता है |

भायं कुभायं अनख आलसहू |
नाम जपत मंगल दिसि दसहूं ||
भगवान का नाम भाव अथवा बिना भाव के जपा जाए वह सदा मंगल ही करता है | भगवान के पार्षदों ने इस प्रकार धर्म का उपदेश दे धर्म की व्याख्या कर यमदूत को वहां से भगा दिया यमदूत भागे भागे धर्मराज के पास आए उनके चरणों में फांसी का फंदा और डंडा फेंक दिया कहा आज से हम आपकी सेवा नहीं करने वाले आप यह बताओ इस संसार में शासन करने वाले कितने लोग हैं क्योंकि यदि बहुत से शासक हो तो दंड की व्यवस्था ठीक से नहीं हो सकेगी।

यमराज ने कहा सेवकों पहले यह बताओ तुम्हारे साथ हुआ क्या सेवकों ने कहा महाराज हम आपकी आज्ञा से पापी अजामिल को लेने गए थे परंतु हमें मार कर भगा दिया गया यमराज ने कहा वे कौन थे दूतों ने कहा हम तो यह नहीं जानते कि वे कौन थे परंतु उन्होंने पीतांबर धारण कर रखा था बड़ा सुंदर उनका स्वरूप था उनकी चार चार भुजाएं थी धर्मराज ने कहा तुम लोग कृतार्थ हो गये क्योंकि तुम्हें आज भगवान के पार्षदों के दर्शन हुए हैं |

सेवकों भगवान नारायण ही इस जगत के एकमात्र कारण है भगवान नारायण के तत्व को ब्रह्मा जी, देवर्षि नारद ,भगवान शंकर ,शनकादि कुमार, कपिल, स्वयंभू मनु ,प्रह्लाद ,जनक ,भीष्म ,बलि, सुखदेव और मैं यह 12 लोग ही उनके तत्व को जानते हैं |

आज से ध्यान रखना जो भगवान के प्रिय भक्त हैं संत महात्मा है उनकी रक्षा भगवान की गदा सदा करती है इसलिए तुम उनके पास कभी मत जाना |
जिह्वा न वक्ति भगवद् गुणनामधेयं |
           चेतश्च न स्मरति तच्चरणारविन्दम् |
कृष्णाय नो नमति यच्छिर एकदापि
           तानानयध्यमसतो कृतविष्णुकृत्यान् ||
( 6.3.29 )
परंतु जिनकी जिह्वा सदा बकवाद तो करती है परंतु भगवान के मंगलमय नामों का उच्चारण नहीं करती जिनका चित्त संसार में तो रचा बसा रहता है लेकिन भगवान के निर्मल नामो तथा निर्मल चरण अरविंदो का मनन नहीं करता जिनका सिर बड़े-बड़े धनाढ्य के सामने तो झुकता है परंतु भगवान के सामने संत महात्मा गुरुजनों के सामने नहीं झुकता ऐसे पापियों को तुम मेरे पास ले आना बे दंडनीय है यम यातना के पात्र हैं |

धर्मराज की इस आज्ञा को पाकर यमदूत मस्तक पर चंदन लगा हुआ देखते हैं, गले में कंठी ,हाथ में झोली माला देखते हैं तो समझ जाते हैं यह तो भगवान के भक्त हैं और उनके आस पास भटकते भी नहीं है |

यहां यमदूत और भगवान के पार्षदों के मुख से जब अजामिल ने धर्म का उपदेश सुना उसका हृदय निर्मल हो गया उसने भगवान के पार्षदों के चरणों में प्रणाम किया उनसे कुछ कहना ही चाहता था कि वे अदृश्य हो गए |

 अजामिल पश्चाताप करने लगा कहां तो मैं महा पापी जिसने अपने कुल को कलंकित कर दिया, अपने माता-पिता का त्याग कर दिया ,अपने ब्रह्मणत्व को नष्ट कर दिया और कहां भगवान का परम मंगलमय नाम जिसके कारण आज मैं कृतार्थ हो गया अब मैं अपनी इंद्रियों को वश में कर ऐसा प्रयास करूंगा कि अंधकारमय घोर नरक में मुझे ना जाना पड़े | परम पूज्य गोस्वामी तुलसीदास जी नाम की महिमा का वर्णन करते हुए रामचरितमानस में कहते हैं----
नाम प्रसाद शंभु अविनाशी | 
साधु अमंगल मंगल राशी ||
शुकसनकादि सिद्ध मुनि जोगी |
नाम प्रसाद ब्रह्म सुख भोगी ||
नारद जानेउ नाम प्रतापू | 
जग प्रिय हरि हरि हर प्रियआपू ||
नाम जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू | 
भगत शिरोमणि भये प्रह्लादू || 
ध्रुव सगलानि जपेउ हरिनाऊ | 
पायउ अचल अनूपम ठाऊ || 
सुमिरि पवनसुत पावन नामू | 
अपने बस करि राखे रामू ||
अपितु अजामिल गजु गनिकाऊ |
भये मुकुत हरिनाम प्रभाऊ || 
कहां-कहौं लग नाम बढ़ाई |
राम न सकहिं नाम गुणगाई ||
ऐसा विचार कर अजामिल ने घर छोड़ दिया हरिद्वार चला आया वह भगवान का भजन किया और भगवान को प्राप्त कर लिया |

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