shrimad bhagwat katha pdf/10-19

shrimad bhagwat katha pdf

श्रीमद्भागवत महापुराण सप्ताहिक कथा
श्रीमद्भागवत महापुराण सप्ताहिक कथा/ दशम, स्कंध भाग-19
दसम, स्कन्ध,भाग-19
अथैकदा द्वारवत्यां वसतो रामकृष्णयोः|
सूर्योपरागः सुमहानासीत् कल्पक्षये यथा ||

श्री सुखदेव जी कहते हैं- परीक्षित

एक बार सर्वग्रास सूर्य ग्रहण लगा उस समय सभी द्वारका वासी तथा सभी नंद गोपी आदी आए, समन्त नामक तीर्थ था वहीं सभी ने स्नान किया जब नंद बाबा को यह मालूम हुआ कि कृष्ण और बलराम यहां आए हैं तो वे श्री कृष्ण से मिलने गए जैसे ही वसुदेव जी ने नंद बाबा को देखा तो हृदय से लगा लिया श्री कृष्ण और बलराम जी ने मैया यशोदा और नंद बाबा को प्रणाम किया |

मैया यशोदा ने कन्हैया को बहुत सालों बाद देखा था उन्होंने प्रेम से उन्हें गोद में बिठा लिया और प्रेम के कारण उनके आंखों से अश्रु प्रवाहित होने लगे माता देवकी और रोहिणी ने मैया यशोदा का अभिवादन किया, बाहर द्वार में खड़ी गोपिया श्री कृष्ण की प्रतीक्षा कर रही थी |

जब प्रभु बाहर आए तो गोपियों ने उन्हें नेत्रों के मार्ग से अपने अन्तःपुर में ले गई श्री कृष्ण ने आज गोपियों को अंतिम उपदेश दिया।

अहं हि सर्वभूतानामादिरन्तोन्तरं बहिः भौतिकानां यथा खं वार्भूर्वायुर्ज्योतिरङ्गनाः

गोपियों संसार में जितने भी पदार्थ हैं उनके आदि मध्य और अंत में केवल में ही में विद्यमान हूं मेरे अलावा कुछ है ही नहीं, आप लोग ऐसा अनुभव करो कि मैं सर्वत्र व्याप्त हूं भगवान श्री कृष्ण ने जब इस प्रकार का उपदेश दिया तो गोपियों का जो जीव कोष था वह दूर हो गया और वे भगवत भाव में स्थित हो गई |

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अनेको ऋषि मुनि देवता यमलात्मा विमलात्मा आदि श्री कृष्ण के दर्शन के लिए आते हैं श्रीकृष्ण ने सभी का स्वागत सत्कार किया और कहते हैं।

न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः |ते पुनत्युरुकालेन दर्शनादेव साधवः |

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं केवल जलों के तीर्थों में ही तीर्थ नहीं है और मिट्टी पत्थर की मूर्ति ही देवता नहीं है यह सब तो हमें दीर्घकाल की तपस्या सेवा से प्राप्त होते हैं , परंतु संत पुरुषों के दर्शन मात्र से ही जो फल प्राप्त हो जाता है वो अनेकों पूजन से नहीं प्राप्त होता |

श्री वसुदेव जी ने ऋषियों के चरणों में प्रणाम किया और कहा

कर्मणा कर्मनिर्हारो यथा स्यान्नस्तदुच्यताम् |
भागवत,श्लोक-

ऋषियों कर्म करते हुए कर्म का अत्यांतिक नाश कैसे हो सकता है ? तब ऋषियों ने कहा--

कर्मणा कर्म निर्हार एष साधु निरूपितः |
यच्छ्रद्धया यजेद विष्णुं सर्वयज्ञेश्वरं मखैः ||
भागवत,श्लोक-

वसुदेव जी कर्मों के द्वारा कर्म वासनाओं के नास का सबसे सरल उपाय तो यही है कि यज्ञों के द्वारा यज्ञ नारायण भगवान की आराधना करें |

वसुदेव जी ने जब इस प्रकार सुना तो वहीं तीर्थ में वही ब्राह्मणों का वरण किया और यज्ञ प्रारंभ कर दिया यज्ञ की पूर्णाहुति के पश्चात ब्राह्मणों को बहुत सी दान दक्षिणा प्रदान की ओर सभी को बिदा किया |

नंद बाबा वसुदेव जी और श्री कृष्ण की प्रसन्नता के लिए कुछ दिन ओर वही रुक गये ओर फिर वृंदावन की यात्रा की | वसुदेव आदि यदुवंशी भी पुनः द्वारका लौट आए एक दिन श्रीकृष्ण और बलरामजी माता देवकी और वसुदेव जी को प्रातः काल प्रणाम करने जाते हैं वसुदेव जी ने आज कह दिया कि कृष्ण मैं तुम्हें जान गया हूं तुम साधारण पुरुष नहीं हो अपितु संसार के आदि करण हो परमपिता परमेश्वर हो |

श्री कृष्ण ने कहा पिताजी आपका कथन सत्य है परंतु

अहं यूयमसावार्य इमे च द्वारकौकसः |

केवल मैं ही परमेश्वर नहीं अपितु आप बलराम जी तथा यहां तक कि सभी द्वारका वासी आत्म रूप से ब्रम्ह ही हैं,श्री कृष्ण ने जब इस प्रकार का उपदेश दिया तो वसुदेव जी की ननात्व बुद्धि नष्ट हो गई, माता देवकी कहती है अगर आप ईश्वर है तो कसं के द्वारा मेरे मारे गए सभी पुत्रों को लाइए |

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श्री कृष्ण और बलराम जी यह सुनते ही सुतल लोग जाते हैं और वहां से देवकी के पुत्रों को ले आते हैं उन पुत्रों ने भगवान के अवशिष्ट दुग्ध का सेवन किया और सब में आत्मज्ञान प्राप्त हो गया उन्हें परमात्म का साक्षात्कार हो गया वह अपने माता-पिता को प्रणाम करते हैं श्री कृष्ण जी को प्रणाम करते हैं और पुनः देवलोक चले जाते हैं,  यह देख माता देवकी का पुत्र मोह नष्ट हो गया |

राजा परीक्षित पूछते हैं गुरुदेव मैंने सुना था कि मेरे दादाजी अर्जुन का विवाह श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा के साथ हुआ था तो आप मुझे यह कथा भी सुनाइए श्री सुखदेव जी कहते हैं परीक्षित जब बलराम जी सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते थे तो यह बात श्रीकृष्ण को पता चली उन्होंने योजना बनाई और अर्जुन को त्रिदंडी स्वामी के वेश में द्वारका ले आए अर्जुन ने वहीं चातुर्मास किया वह दिनभर भजन करते और रात्रि में सत्संग करते उनके सत्संग की चर्चा चारों ओर फैलने लगी |

एक दिन बलरामजी भी सत्संग सुनने के लिए आए उन्होंने त्रिदंडी स्वामी जी को भोजन के लिए आमंत्रित किया जब अर्जुन भोजन के लिए आए तो श्रीकृष्ण ने सुभद्रा से कहा बहन यह कोई स्वामी त्यागी नहीं है यह तो हमारे गांडीव धारी अर्जुन है तुम महल के पीछे जाओ वहां रथ खड़ा है आप इन को लेकर यहां से भाग जाओ। 

जब सुभद्रा जी अर्जुन के साथ भाग गई जब यह बात दाऊ दादा को मालूम हुई तो बड़े क्रोधित हुए, श्री कृष्ण ने समझाया भैया अगर आप युद्ध करोगे तो हमारी बड़ी बदनामी होगी सबको यह पता चल जाएगा कि हमारी बहन अर्जुन के साथ भाग गई है इससे तो अच्छा है कि हम उनका विवाह करा दें, वैसे भी हमें अर्जुन से अच्छा वर कहां मिलेगा |

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इसलिए विवाह की सामग्री लो और सुभद्रा का विवाह अर्जुन से कर दो बलराम जी ने जब यहां सब सुना तो उन्होंने भी इस बात पर अनुमोदन किया उन्होंने सुभद्रा का विवाह अर्जुन के साथ कर दिया |

श्री सुकदेव जी कहते हैं परीक्षित मिथिलापुरी में श्री कृष्ण जी के दो भक्त रहते थे एक थे स्रुतदेव ब्राह्मण और दूसरे थे राजा बहुलाष्व उन्होंने एक साथ भगवान को आमंत्रण भेजा प्रभु हमें भी सेवा का अवसर दीजिए जब एक साथ दोनों भक्तों के यहां से आमंत्रण आया तो श्री कृष्ण और उद्धव जी दो दो रूपों में विभाजित होकर वहां पधार गए।

जैसे ही श्रुतदेव ब्राह्मण ने भगवान को देखा तो बड़े प्रसन्न हो गए, अरे वह तो प्रेम में नाचने लग गए और उसके बाद राजा बहुलाष्व ने श्री कृष्ण और उद्धव जी को देखा तो उनका स्वागत सत्कार किया |

श्रीकृष्ण ने दोनों भक्तों को आशीर्वाद प्रदान किया और पुनः द्वारका लौट आए राजा परीक्षित पूछते हे गुरुदेव जितने भी मनुष्य और असुर हुए हैं वह भगवान शंकर की ही उपासना क्यों करते हैं श्री सुकदेव जी कहते हैं परीक्षित भगवान शंकर हमारे वे तो आशुतोष है शीघ्र अति शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता हैं, इसलिए सभी इनकी उपासना करते हैं इस विषय में मैं तुम्हें एक इतिहास सुनाता हूं |

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